कविता · Reading time: 1 minute

मेरी कविता

जब मौसम हो सुहाना तो,
खुशियाँ ही खुशियाँ हो,
हसीन मंज़िलों के जैसे,
खुबसूरत सा सफ़र हो,
सारे जहाँ में लिखा,
जो मैंने पैगाम तुम्हारा हो,
आँचलों में छुप गये हो,
तुम ही कहीं ढूँढ़ रही थी;
सारे जहाँ में ये आँखें तुम्हें ही;
फिर भी गुपचुप गुमसुम से,
पीछे हट जाते हो तुम कहाँ-कहाँ;!

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