कविता · Reading time: 1 minute

मेरी कल्पना

कल्पना की एक रोज़ मैने एक अच्छे आदर्श समाज की,
इंसानियत से लबरेज़ कल्पना की एक अच्छे इंसान की,
जहां हर भूखे की भूख मिटाने खटकते संसद के द्वार की
और जहां कोई न सोए तारों की चादर ओढ़े आसमां की,
जहां फिर सभ्यता संस्कृति के रंग खिल उठे उस समाज की,
हां कल्पना की मैने विश्व की हर ऊंचाई छूते अपने भारत की,
राग द्वेष से प्रथक हर रिश्ते में मर्यादा और प्यार से भरे समाज की,
दरिंदगी और हैवानियत की खबरों से रहित छपते हर अख़बार की,
कल्पना है चहुं ओर शासन में उठती लोकतंत्र की हुंकार की,
और विश्व को बनते वसुधैव कुटुंबकम् के आधार की,
जहां कोई खबर न आए किसी फौजी की शहादत की,
और युद्ध में न बुझ पाए चिराग की लौ घर के आंगन की,
भ्रष्टाचार पर लगाम लगे और बराबरी का हक मिल रहा सबको,
और कोई पढ़ा लिखा युवा बेरोज़गारी न भटक रहा हो,
मेरी इस कल्पना में सम्मान हर बुजुर्ग और नारी को मिल रहा,
इसलिए यहां कोई वृद्धाश्रम और बहू उत्पीड़न का मसला नहीं दिख रहा,
जहां हर अनाथ को मिल रहा है मा बाप का साया ,
और हर बेटी संग बेटों को तहजीब का पाठ सिखाया जा रहा,
कल्पना यह मेरे आदर्श समाज की कल्पना बन कर रह गई,
जब आंख खुली तो फिर अख़बार में वही पुरानी खबरे आने लगी,
कुछ नहीं बदलेगा यहां जब तक अपनी सोच को न बदलेंगे,
समझेंगे नहीं गलती अपनी तो कल्पना ही करते रह जाएंगे।

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