मेरी कलम

मेरी क़लम बोलती है,
शोषण, ज़ुल्म, अन्याय
के ख़िलाफ लिखती हैं
गलत के खिलाफ आवाज उठाती है,
हमेशा,कलम मेरी !

पर कभी कभी रोती है,
बिलखती है,तड़फती हैं
वो कितने गहरे दर्द अपने भीतर
दफन किये चलती रुकती है
हमेशा क़लम मेरी !

मेरी क़लम चलने को आतुर
जारी रहती अंत लिखने तक
किसी भी तरह के दर्द को सहती
सीना ताने चलती रही बया करती है,
हमेशा,क़लम मेरी !

हमेशा,रही निशाने पर
सत्ताधारियों को चुभती सी
मेरे कलम की नोक जैसे
आंख में किरकती स्याही
हमेशा,मेरी क़लम की !

रही शीर्ष पर बिना बंधे
बिना डरे हिला डाले बड़ो बड़ो के
सिंहासन तक अपनी चाल से
व्यवस्था सुधरती बिगड़ती देखी
हमेशा मेरी कलम ने !

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पुस्तकालयाध्यक्ष ग़ाज़ियाबाद में पिछले 22 वर्षों से पब्लिक स्कूल में कार्यरत। लेखन- साहित्य रचना एवं...
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