कविता · Reading time: 1 minute

मेरी अनपढ़ माँ

मेरी अनपढ़ माँ
जिसे नहीं पता शब्दों के अर्थ
लोभ-लालच, छल-कपट
उसके लिए सब हैं व्यर्थ
जोड़-घटाना, गुणा-भाग कर
उसने कभी नहीं जोड़ा मूलधन में ब्याज
उसका प्रेम निस्वार्थ ही है आज
मेरी अनपढ़ मां
नही बना सकती रेखाओं से चित्र,
ना ही उसे आते खींचने काल्पनिक परिदृश्य
माँ कुछ भी नहीं पढ़ती है
फिर भी मेरी खुशियों के लिए रोज भगवान से लड़ती है
माँ अनभिज्ञ है, समाज के विज्ञान और विज्ञान के ज्ञान से, पर
मेरी अनपढ़ माँ
मुझे देख कर मेरा समूचा चित्र गढ़ लेती है
मेरे चेहरे पर दुःख की हर लकीर पढ़ लेती है

विजय बेशर्म गाडरवारा

Competition entry: "माँ" - काव्य प्रतियोगिता
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सम्प्रति-अध्यापक शासकीय हाई स्कूल खैरुआ प्रकाशित कृतियां- गधा परेशान है, तृप्ति के तिनके, ख्वाब शशि के, मेरी तुम संपर्क- प्रतिभा कॉलोनी गाडरवारा मप्र चलित वार्ता- 09424750038
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