मेरी अनपढ़ माँ

मेरी अनपढ़ माँ
जिसे नहीं पता शब्दों के अर्थ
लोभ-लालच, छल-कपट
उसके लिए सब हैं व्यर्थ
जोड़-घटाना, गुणा-भाग कर
उसने कभी नहीं जोड़ा मूलधन में ब्याज
उसका प्रेम निस्वार्थ ही है आज
मेरी अनपढ़ मां
नही बना सकती रेखाओं से चित्र,
ना ही उसे आते खींचने काल्पनिक परिदृश्य
माँ कुछ भी नहीं पढ़ती है
फिर भी मेरी खुशियों के लिए रोज भगवान से लड़ती है
माँ अनभिज्ञ है, समाज के विज्ञान और विज्ञान के ज्ञान से, पर
मेरी अनपढ़ माँ
मुझे देख कर मेरा समूचा चित्र गढ़ लेती है
मेरे चेहरे पर दुःख की हर लकीर पढ़ लेती है

विजय बेशर्म गाडरवारा

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