मेरा हर्ष मनाया जाए (शाश्वत-गीत)

जिस दिन मैं दुनियाँ से जाऊँ,
मेरा हर्ष मनाया जाए।

हुए बहुत दिन जिंदा रहते,
अब तो मरना ही होगा ।
साँसों के आने-जाने को,
अब तो थमना ही होगा।
व्यर्थ प्रलाप रुदन न करके,
मुझे शांति से भेजा जाए।

कविता रचकर प्यार बिखेरा,
किया आपको आनंदित ।
रूकी कलम औ’सूखी स्याही,
काग़ज सब हो गए खण्डित।
शब्दों के माया-चक्कर में ,
अब न मुझे फँसाया जाए ।

नहीं चाहिए मुझे कफ़न भी,
और न रखना फूल लाश पर।
शिष्टाचार न करना कोई ,
अर्घ्य न देना तुम अँजलि भर ।
पिण्डदान की प्रक्रिया से ,
मित्रो मुझे बचाया जाए ।

स्मृति में न लाना मुझको,
और न सिसकी भरना मित्रो।
शाश्वत इस भगवत-गाथा को,
दूषित तुम न करना मित्रो।
मेरे बाद नाम पर मेरे ,
पंथ न कोई चलाया जाए ।

चलो आज तक चली कहानी,
अब विराम देता हूँ इसको ।
दुविधा में न पड़ना बिल्कुल,
अर्थी पर न रखना शव को ।
त्रयोदशी दशगात्र भी न हो,
और न शोक मनाया जाए।

चिकित्सको ! तुम आँखें मेरी,
अँधे बच्चों को दे देना ।
यकृत किडनी भी निकालकर,
यथायोग्य आरोपित करना
हड्डी भी यदि काम आए तो,
उसे भी दान कराया जाए।

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