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मेरा साया

अंधेरे में नही होता मेरा साया मेरे पास तब मुझे होता है मेरे होने का अहसास
उजाले में जब घटता -बढता है मेरे साये का आकार
उद्वेलित हो उठते हैं मेरे मन में मेरे लिये मेरे ही विचार
मन कहता है कि ये साया है एक नारी का, जिसका न कोई अस्तित्व ना कोई पहचान है
कर दिए जाते हैं चसपे रिश्ते इसपे और दे दिए जाते सौ नाम है
दिन के उजाले में मुश्किल होता है इन नामों के साये में जीना
क्योंकि हर रिश्ता कहता है कि तुम एक नारी हो तुम्हे ये है मना और ये नहीं करना
सारी हदें तय है तुम्हारे लिये तुम्हे नही है लांघना
तब चिढाता है मुझे मेरा बोना आकार मगर तभी कहता है मेरा विशाल मना
ना करो तुम साये का विश्वास ना डरो तुम साये से और ना ही साये की तरह रखो डर को मन में
करो मजबूत अस्तित्व अपना बनाओ वजूद स्वयं अपना
मिलेगा अस्तित्व तुम्हे भी एक इंसान जितना ….
मिलेगा अस्तित्व तुम्हें भी एक इंसान जितना …।

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