कविता · Reading time: 1 minute

मेरा सपना

एक दिन मैंने सपना देखा ,
उसमे मैंने खुद को देखा ..
मैं भारत की वीर सिपाही ,
पहनी थी मैंने खाकी भाई !
एक हाथ बंदूक लिए ,
दूजे में राष्ट्र का गौरव ध्वज ..
चट्टानों को चीर कर,
दुश्मनों का संहार किया
बनाये इतिहास नए..!!!
आँख खुली तो मैंने पाया ,
ये तो बस एक सपना था ..
फिर भी कितना अपना था !!!
ये सपना अब सच होगा ..
देश मेरा विकासशील से विकसित होगा !!!
नहीं झुकेगा , नहीं रुकेगा …
हर पग पर आगे बढ़ेगा ..
मेरा सपना अब सबका अपना .

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मीनू यादव स्नातकोत्तर (हिंदी ) टी.जी. टी .(अध्यापिका ) मेरे लेख और कविताएँ कई अखबार , पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं l
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