कविता · Reading time: 1 minute

मेरा ” मैं “

सिरताज मेरा जब
गिरेगा निस्तेज होकर
ज़िस्म की दरारों से निकलकर
मेरा ” मैं ” आजाद होगा ।

बिखरेगा हवा में
और ताज़ी सांस लेगा
नफ़्स मेरा सर उठाकर
फ़तेह कर ज़िस्म को
ख़ाक होने के लिए
लिबाज़ को अकेला छोड़ देगा ।

आजाद ” मैं ” मेरा
नही दुर्बल ,
ना गुलाम होगा
हर सवाल पर बेबाक होगा
और सामने
मौत का शैतान होगा ।

खूंखार होकर
दिल खोकर
उसकी हुक़ूमत पर
ज़लील उसको करेगा
तू खुदा है या खता है
इंसानियत के ज़ुल्म की
पेशगी करेगा ।

” मैं ” मेरा आजद होकर
जन्नत के ताज
को फ़ेंक देगा
जिसने बनाया ज़ुल्म को
जालिम ज़िस्म को
उसकी तकरीर को
निरस्त करेगा ।

हर गुलामी की
कड़ी को तोड़कर
जिस्मों के बंधनो को
जिस्मों के सहारे छोड़कर
नूर से रिस्ता
फिर से जोड़लेगा ।

ना मेरा स्वाद था
ना मेरा इश्क़
इश्तियाक था
कफ़स से आजाद होना
शून्य में शून्य होना
मेरा इतंजार था ।

दिन रात का तोड़ बंधन
सुख दुख का
छोड़ दामन
मैं , मेरा आवाज़ देगा
गर्द को छोड़ जमीं पर
पानी भाप बन
बादल में फिर से
जा मिलेगा ।

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