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मेरा प्रेम

Chandra Prakash

Chandra Prakash

लघु कथा

August 14, 2017

आज नीतू का जन्म दिन था .. नीतू कौन ?
भाई वर्तमान में जो मेरी सखी है …। आप जैसे पढ़े लिखे लोगों की भाषा में गर्ल फ्रेंड …
टेवल के उस छोर में बैठी नीतू आज मुझे कुछ ज्यादा ही अच्छी लग रही थी लगे भी क्यों ना भाई मैंने जो रेड टॉप दिलाया था पिछले हफ़्ते वो ही उस ने पहना था और उस ने जो सेन्ट लगया था वो मुझे मदहोश ही कर रहा था ..। मन तो था उस के हाथों में हाथ रखूं लेकिन अगले पल ख्याल आया कि भाई कहीं लाफा मार दिया तो कॉलेज में क्या मुँह दिखायेगा …?
लेकिन भगवन ने मेरे मन को पढ़ लिया था शायद … उस ने सरकाते हुए हाथ मेरे हाथों पर रख लिए … और बोली क्या हुआ चंदर …?
आज कुछ बोल क्यों नहीं रहे हो …?
मैं कुछ लडखडाती आवाज़ में बोला … कुछ ….. नहीं …।
तभी पीछे से घोड़े की नाल जैसे आवाज मेरे कानों में गूँजी आवाज कुछ जानी पहचानी थी … । तभी जिस का नाम मेरे दिमाग़ में आया वो मेरी पिछली सखी थी …। अभी भी दिल के किसी कोने में उस के लिए स्थान था क्योंकि बहुत समय तक साथ रहे थे उस का असर तो होगा ही …और जिन दिनों वो छोड कर गई थी उन दिनों में रोया भी कम नहीं रात – रात भर जाग कर रोया … चलो छोड़ो … उसका नाम सुधा था जिसे मैं अब भी भूलने का प्रयास करता था ..।
नीतू के पास आकर ना जाने सुधा ने क्या कहा ..।
कुछ फुसफुसाने की सी आवाज सुनाई दी ।
और फिर मेरी तरफ मंद मुस्कुराते हुए सुधा चली गई ।
नीतू क्यों क्या हुआ ??
सुधा क्या कह रही थी ??
नीतू बोली – कुछ नहीं बस हमारी पर्सनल बातें हैं ।
मैं कुछ समय कुछ नहीं बोला .. ।
बस डर गया था क्योंकि मैं नीतू को नहीं खो सकता था ..।
मुझे प्रेम उस के सौंदर्य ने नहीं मन और उस के भावों से हुआ था ।फिर नीतू ने अपना हाथ उठा कर मेरे हाथ में रखा दिया और धीरे से बोली – बस तुम्हारे बारे में कह रही थी कि सही लड़का नहीं है , जो मुझे धोखा दे सकता है तुम्हें भी बस ।
लेकिन चंदर मुझे पता है और तुम्हें पिछले चार साल से जानती हूँ .. ।
हाँ वो बात अलग है हमारी व्यक्तिगत पहचान कुछेक महीने पहले ही हुई है , लेकिन मैं भी दिल्ली की लड़की हूँ किसी पर यूँ ही विश्वास तो नहीं कर सकती हूँ ना …।
हाँ लेकिन …।
तुम कुछ मत बोलो मुझे सब पता है सुधा को तुम ने छुआ तक नहीं है । मैं तुम्हें नहीं जानती क्या ??
और वो अब जिस के साथ घूमती है उसे भी जानती हूँ . विवेक नाम है उसका ।
एक समय मुझे लाइन मारा करता था एक दिन जब सुनाया तब से लाइन में आया। बस अपने मतलब के लिए लव सव में फसती है । लेकिन मुझे ताज्जुब है तुम कैसे फस गए ?
लेकिन मैं तुम पर खुद से अधिक विश्वास करती हूँ क्योंकि
तुम चाहते तो अपनी लव स्टोरी छुपा भी सकते थे या झूठ भी बोल सकते थे ।
लेकिन तुम ने मुझे पहले ही सच बताया ..।
और रही बात धोखे की तो वो तुम दे नहीं सकते ..।
मैं रो पड़ा । बस इतना विश्वास काफी था मेरे लिए .।
मेरे प्रेम के लिए ..।
नीतू ने एक माँ की तरह मेरा सिर सहलाया और बोली .क्यों चंदर इतनी सी बात में रो पड़े ?
मैं लड़की हूँ मैं नहीं रोई बस चुप हो जाओ अब ।
बस रोने दो मुझे । मैं इंसान हूँ उस के उद्गार निकल जाने दो ।
बस कुछ देर फबक फबक कर रोया और फिर चुप हो गया ।
कुछ दिल में ठंडाक पड़ी । और सुधा के ऊपर गुस्सा भी आ रहा था कि मैंने क्या धोखा दिया ??
लेकिन नीतू की बातों से दिल रोमांचित भी था ।
लास्ट ईयर के पेपर होने थे विषय एक होने से नीतू और मैं एक साथ तैयारियां करते । लाइब्रेरी में साथ में पढ़ते , क्लास में एक साथ होते ।जब लाइब्रेरी में मैं पढ़ कर थक जाता तो बस नीतू की एक मुस्कान मुझे नई ऊर्जा प्रदान करती ।
बस यूँ ही दिन कट जाते थे । पेपर हो गए अच्छे से बसन्त का आखरी सप्ताह तक । अब रोज रोज का मिलना नहीं जानकर मैं दुःखी था । बैठा था पर्क के एक कौन में आँखों में आंसू , काँपते हुए होंठ , हृदय गति तेज , मन विचलित .।
तभी पीछे से एक आवाज सुनाई दी …..
चंदर यहाँ क्या कर रहे हो ?
सारे दोस्त अंदर हैं तुम अकेले क्या कर रहे हो ..? कहाँ कहाँ नहीं ढूढ़ा तुम्हें फिर मंजु ने कहा कि चंदर पार्क के कोने में बैठा है ।
हाँ नीतू बस कुछ घबराहट हो रही थी सोचा यहाँ आ कर बैठ जाऊ ।
चंदर झूठ क्यों बोलते हो तुम आँखों के आँसु पोछ सकते हो . मुख और हृदय के भाव नहीं ।
बस मेरी आँखें छलक उठी ..। बस करो यार ..! क्या हो गया तुम्हें ?
मैं रोता हुआ बोला कुछ नहीं ।
बस कल से नहीं मिलेंगे ना तुम और मैं इस लिए ..।
अरे पगले क्यों नहीं मिलेंगे ?
आ जाया करेंगे कभी कभी …। तुम भी ना दुल्हन की तरह रोते हो …।
अब हँस दो ..।
बस ऐसे ही दोस्तों से मिला …। अब अलविदा कहने की बारी थी मैं अंदर से रो ही रहा था लेकिन नीतू को परेसान नहीं करना चाहता था बस आँसू हृदय में समेटे बोला चलो कभी मुझे भी याद कर लेना .। नीतू ने हाथोँ का इशारा कर गले मिलने को कहा .. । बस बिछुड़न की पीड़ा दिल में थी ।
मैट्रो में रोका रहा आसुओं को जो अपने कमरे में आया .. बस रोता रहा ..। 6 बजे से 9 बजे तक जब फोन की रिंग बजी ..।
हाँ हैलो नीतू ….
हाँ चंदर तुम अभी भी रो रहे थे ?
नहीं नहीं बस टीवी देख रहा हूँ उस से आवाज़ आई होगी रोने की …।
चलो ठीक है तुम को पता है cgl के फॉर्म निकले हैं भर दो …।
हाँ ठीक है नीतू थैंक्यू ..।
चलो ठीक है बाय …
कुछ समय बीत गया यूँ ही ।
ना मैंने फॉर्म भरा और ना ही तैयारियाँ की ..।
बस नीतू जब भी पूछती क्या कर रहे हो ?
मैं कहता बस तैयारी कर रहा हूँ ।
कुछ ही टाइम में CGL का पेपर हुआ .। नीतू परीक्षा में उत्तीर्ण हुई ..। साक्षात्कार के लिए चुनी गई …।
मैं खुस था ..। अब परिणाम घोषित हुए ..। उसे भारतीय कर विभाग में नौकरी भी मिल गई । एक दिन फोन आया .. हैलो चंदर कैसे हो ?
ठीक हूँ बस ….।
और तुम को पता है मुझे नौकरी मिल गई ..?
हाँ मुझे पता है तुम ने फेसबुक में सेयर जो किया था ।
ओह्ह्ह हाँ ..।
और तुम्हारा क्या हुआ ??
क्या कर रहे हो आज कल ??
बस कुछ नहीं ।
नीतू बोली अभी ssc के फिर फॉर्म निकले हैं फिर भर दो …।
हाँ ठीक है भरता हूँ इस बार ..।
और तुम्हें पता है मैं मुम्बई में जॉब करुँगी ?
ओह्ह बहुत अच्छा ..। बधाई हो ..।
चलो बाय मैं फिर बात करती हूँ ।।
बाय बाय …।
जैसे ही फ़ोन कट किया मुझे लगा कि चन्दर जिन्दगी तो खत्म अब क्या करेगा ? लेकिन अपनी भूल पर दुःख भी हुआ कि मैंने भी तैयार कर ली होती तो मैं भी नैकरी कर रहा होता । लेकिन मेरा एक मन कहता हाथ काट लूँ , पंखे से लटक कर जान दे दूँ और ना जाने क्या क्या विचार कर नहा था। ..लेकिन नीतू की एक मुस्कान भरी फ़ोटो मेरे कमरे मैं लगी थी । जो हर बार की तरह इस बार भी मुझे टूटने से बचा लाई और मुझे नई ऊर्जा मिली ।
और नीतू की एक बात याद आई कि हर हार के बाद जीत शुरू होती है .। मैं उस हार को , क्षोभ को जीत समझ कर रोया नहीं बल्कि कुछ करने की ठान कर मुदित हुआ । तभी एक मित्र का फ़ोन आया ।
हैलो कौन ?
मैं मुकुल ..
ओह्हहह भाई आज आप को हमारी याद कैसे आ गई ..? (क्योंकि कालेज छोडे एक साल से अधिक हो गया था ।
भाई हम तो याद करते ही हैं , तू भी कर लिया कर ..। और बता नीतू के क्या हाल हैं ..? सारी सारी भाभी जी के क्या हाल हैं ?? सुना है उस ने सीजीएल निकाल दिया ..।
हाँ ।
और इसी हफ़्ते मुम्बई भी जा रही है।
भाई उसे बदनाम मत किया कर यार मैं उसके लायक नहीं हूँ । बस अब से भाभी मत बोलना ।
अरे कुछ हुआ है क्या ?
नहीं नहीं बस यूँ ही ।
चल छोड़ और हाँ सिविल सर्विस के फ़ार्म निकले हैं वो भर दे ।
हाँ ठीक है देखता हूँ ।
चल ठीक है भाई चन्दर फ़ार्म भरेगा तो बता देना .साथ में कोचिंग करेंगे ।
हाँ ठीक है बता दूंगा ।
चल बाय चन्दू ..
बाय बाय ..।
मैंने कुछ समय इन्टरनेट टटोला और जितनी भी जाँब निकली थी सब खोज डाली और निर्णय किया कि सिविल सर्विस का फ़ार्म भरुगा और जो भी होगा देखा जाएगा ।
फ़ार्म भरा और कुछेक किताबें ले आया .। अब ठान ली थी कुछ कर दिखाना है …। और जब भी उदास होता नीतू की लिखी कविता पढ़ लेता , उसी की लिखी एक ग़ज़ल गुनगुना लेता ..।बस मन हल्का हो जाता ..। रात रात भर पढ़ता ,कई बार किताबों में ही सो जाता और कई बार सुबह तक पढ़ता रहता..।
सुबह चार बजे उठ जाता और कुछ योगादि कर के पढ़ने बैठ जाता ।
माँ कई बार बोलती इतना मत पढ़ा कर आँखें ख़राब हो जाएँगी , और बोलती अपनी शक्ल देखी है तूने ? तुझ से शादी कौन करेगा ?
लेकिन पिताजी भी कहाँ पीछे रहने वाले कहते कि भाग्यवान पढ़ता लिखता कुछ नहीं फ़ोन में लगा रहता होगा …। इसके लिए मैंने कहाँ कहाँ सिपारिश नहीं की वर्मा जी का लडका देख आज बाप के साथ में ही चपरासी है …और पढ़ा क्या है बारवीं ..
तू तो बी.टेक है ..।
माँ टोकती और कहती कर लेगा ना ..?
जवान खून है हर बार उल्टा मत बोला करो ।
पिताजी फनकते हुए आफिस को चल देते ।
लेकिन मुझे अब किसी की बात से दुःख नहीं होता ना भाई की बात से ना पापा की और बहन तो हर बात में सपोट ही करती है .।
ऐसे ही दिन गुजरते गये ..माँ रोज़ मंदिर से प्रसाद लाकर देती देती सफलता की कामना करती ।
एक दिन माँ कमरे में आई और सिर में हाथ रख के बोली बेटा इतना मत पढ़ा कर । देख दो ही महीनों में तू बुड्डा सा हो गया है ..ना जाने किस की नज़र लग गई तुझ को । तेरे बापू से कहूँगी शाम को कुछ मेवे और रियल के जूस ले आए ..रात को पढ़ता है तू पी लिया करना ..।
नहीं माँ रहने दो पापा की तनख़ाह का आधा हिस्सा तो मेरी किताबों और मेरी चीज़ों में चला जाता है ।
और पापा से बोलना भी मत फिर आप को बोलेंगे वो कि सिर में चढाया है..।और इस महीने नेहा की भी सेमेस्टर फीस जानी है .।
माँ बोली मैं अपनी आर.डी. तुडवा लूंगी ..। बीस हज़ार उस में हैं तू अपने लिए ले आना ..।
माँ को ना नहीं कह पाया लेकिन मेरी आँखें नम हो गई ..माँ बोली क्या हुआ पंकू तुझे क्या हुआ ..?
तुझे ससुराल नहीं भेज रही हूँ में ..।
मैं हँस दिया …बस माँ ने अंक भर लिया मुझे नन्हे बच्चे की तरह ।

।। 4 ।।
माँ दूसरे ही दिन आर . डी . के पैसे निकाल लाई और बोली ले पंकू ये पैसे हैं जो लाना है ले आ…।
मैं इनकार करता रहा लेकिन माँ नहीं मानी आख़िर में मैं माँ से हार गया और पैसे ले लिए ..।
बस यूँ ही समय जाता रहा , एक दिन अचानक नीतू का फ़ोन आ गया ।
हैलो …
ह्ममम
हैलो बोला मैंने चन्दर ..
हाँ हैलो ..
इतने दिनों से फोन कर रही थी क्यों नहीं उठाते हो फ़ोन ..?
और ना मैसेज का उत्तर ना फेसबुक क्या हो गया तुम को ..?
अरे वो ..
तुम तो बोलो ही मत जब प्यार करते थे तब बोला नहीं ..
अब भी मुझ से बचते फिर रहे हो ..
और सुनो मैं अगले हफ़्ते दिल्ली आ रही हूँ , मिलना है मुझे तुम से ..
ठीक है मिलता हूँ ..
हाँ,और तुम्हारा क्या चल रहा है ..?
कुछ नहीं बस , सिविल सर्विस की तैयार कर रहा हूँ …
ओह्हहहह गुड ..और कोचिंग कहाँ से ले रहे हो ..?
नहीं ..अभी तो पहले दो पेपरों की तैयारी खुद ही कर रहा हूँ .और अगर पास हुआ तो तब देखूँगा …।
ओह्हहह और तैयारी कैसी हो रही है ..?
तैयारी बहुत अच्छी हो रही है …
चलो अच्छा है चन्दर ,हाँ तुम अपना एस.बी.आई. बैंक का अकाउन्ट नं देना मुझे कुछ काम है …
क्यों क्या काम है .?
तुम से माँग रही हूँ दो ..तुम्हारे पैसे नहीं निकालूँगी ..
हाँ देता हूँ .
ह्ममम
चलो मैं अकाउन्ट नं मैसेज करता हूँ ..
चलो ठीक है …
चलो बाय ..
बाय बाय .
मैंने जैसे ही अकाउन्ट नं मैसेज किया , कुछ ही समय में मैसेज आया …
हैपी बर्थडे डियर चन्दर ..एण्ड आई मिस यू ..और अपना अकाउन्ट नं चैक कर लेना मैंने तुम्हारे लिए गिफ्ट और तुम्हारी तैयारी के लिए और किताबों के लिए कुछ पैसे भेजे हैं ।
नीतू तुम पागल हो गई हो क्या ? क्यों भेजे तुम ने पैसे नहीं चाहिए मुझे…मैं रिफन्ड कर दूँगा मुझे नहीं चाहिए पैसे बस ..
ओहो आज तो तुम बडे पैसे वाले बन रहे हो चन्दर ..तुम से भी मैं कालेज के टायम में गिफ्ट लेती थी ना मैं ?
बस हो गया अब लौटा रही हूँ ..
मैंने कभी कहा चन्दर मुझे गिफ्ट मत दो .तो ..
मुझे कुछ नहीं सुनना है …मुझे किसी के पैसे नहीं चाहिए बस ..
चन्दर तुम्हें मेरी कसम तुम को लेने होंगे ..
बस यूँ ही तू तू मैं मैं हूई और आख़िरकार मुझे मानना पड़ा ..
चलो ठीक है अगले हफ़्ते मिलती हूँ और फ़ोन उठा लेना …
हाँ ठीक है ..
चलो मिलता हूँ ..
बस यूँ ही तीन दिन बीत गये एक दिन नीतू का फ़ोन आया ..
हैलो ..
हाँ हैलो ..
कैसे हो चन्दर ..?
बस जैसा तीन दिन पहले था ..
तुम पहले से बहुत बदल गये हो , अब तो सही से बात भी नहीं करते .
तुम को देखने का कितना मन है तुम नहीं समझ सकते चन्दर ..
हाँ कब आ रही हो तुम दिल्ली ?
आज आ रही हूँ ..कल मिलती हूँ ..
पहले तुम से मिलने का मन है मुझे फिर मैं घर जाऊँगी ,कहाँ मिलोगे ?
तुम बताओ नीतू ?
चलो सी . पी.मैं मिलते हैं जहाँ पर हम अक्सर छोले पूडी खाया करते थे …।
आह्हहह विक्की भय्या की दुकान में ?
तुम्हें अब तक उनका नाम याद है ..?
हाँ ..
चलो सही है वहीं मिलते हैं ..
ठीक है नीतू ..बाय
बाय बाय …
कल मिलना है ये जान कर मैं विचलित भी था , ना पढने में बुद्धि स्थर हो पा रही थी , ना ही अन्य कार्यों में …
सोच विचार में दिन के तकरीबन चार बज चुके थे ..
हृदय की गति दोगुनी हो रही थी ..मन अशान्त था.।
मैं कुछ समय छत में टहलता रहा ..कुछ कविताएँ गुनगुनाने लगा हरिवंश राय बच्चन जी की ..मुझे छायावादी कवि समझ भी आते थे ,और काव्य भी अच्छा लगता था ।
इस एक साल में कामायनी कई बार पढ़ चुका था उस की एक एक पंक्ति मुझे उर्जा प्रदान करती थी ।
रही बात पन्त जी निराला जी की , महादेवी वर्मा की वो मुझे बचपन से ही प्रिय थे …और मेरे पिता जी के पंसदीदा कवि निराला जी और उन की कविता …
श्वानों को मिलता दूध वस्त्र ..
भूखे बच्चे अकुलाते हैं …।
मैं कुछ देर गुनगुनाता रहा फिर उदास बैठा था …और सोच रहा था कल नीतू से मिलने जाऊ या नहीं ?
तभी पीछे से आवाज़ आई …
चन्दर छत में क्या कर रहे हो ??
आज कल तो दिखते भी नहीं , और ये क्या लुक बना रखा है ?
किसी ने धोखा दे दिया क्या ..?
खीखीखीखी ,…..
मैं कुछ देर कुछ नहीं बोला …
फिर बोला कुछ नहीं …..कुछ भी तो नहीं …
(इन दिनों मेरे आँखें भी धस चुकी थी हाथ पैर भी कमज़ोरी से कापने लगते , क्योंकि केवल पढ़ता ही रहता खाने का भी समय नहीं )
तभी मेरे कन्धे में जिस ने हाथ रखा वो मेरे सामने रहने वाली लड़की थी जो कई बार मुझ से कम्पयूटर सही कराने या कभी कोई फ़ार्म भरवाने के लिए आया करती थी , या फिर कोई और बहाने और फिर हर बार मुझे छेडा करती थी ..। उस का बचपन से ही सपना था कि उस की शादी मुझ से हो …
जैसे ही मेरे कन्धे में हाथ रखा मैं असहज ही बोला ।
हाँ ….क्या कर रही हो तुम ??
तुम लडके हो कर इतने शर्मीले कैसे हो सकते हो ..?
नहीं नहीं ऐसा कुछ नहीं है …
वो तो दिख ही रहा है चन्दर ,
तुम क्यों आई हो .?
क्यों मैं बिना काम के तुम्हारे पास नहीं आ सकती …बुद्धू ..और एक थपकी सिर में दे मारी …
मुझे सिर मैं मत मारा करो मैं अब तुम्हारा स्कूल का दोस्त चन्दर नहीं …
तो चन्दर बाबू क्या हो गये हो ??
भारत के राष्ट्रपति ..?
नहीं ना ..?
(हाँ मैंने बताया नहीं इस पगली लड़की का नाम क्या था …?
पिंकी नाम है उसका …)
हाँ राष्ट्रपति तो नहीं लेकिन उस से कम भी नहीं …
हाँ ये छोड़ो …एक काम है तुम से चन्दर ..
हाँ बोलो ?
तुम सच में मेरी बात मानोगे ..?
कसम खाओ मेरी ..
हाँ बोला ना ,बताओ तो सही ..
कल मुझे इंटरव्यू के लिए जाना है गुडगाँव मेरे साथ चल दोगे …
नहीं नहीं मैं नहीं आ सकता .
क्यों अकेले नहीं जा सकती हो ..
कालेज तो तुम जाती ही थी …।
ये तो ग़लत बात है तुम ने पहले हाँ कहा था ..।
चल मेरा दिमाग़ मत खा मैं सोच कर बताता हूँ …
चल ठीक है ..
मैं काल करती हूँ ।
चल ठीक है …
मैं कुछ देर छत से टहलता रहा फिर अपने कमरे में आ गया …।
पिताजी द्वारा प्रदत्त अभिज्ञानशाकुन्तलम् की प्रति को निहारता रहा , कुछेक छन्द पढ़ कर आत्मसात किए . और मुझे शकुंतला का रूप सौन्दर्य , गुण खुद की प्रेमिका में दिखते और खुद को मेघदूत का यक्ष जो शापित है , और प्रयसी के प्रेम से वंचित उसे पाता ।
मेघदूत और शाकुन्तलम् का अँग्रेज़ी अनुवाद कई बार पढ़ा लेकिन वो कभी भी हृदय चुम्बित नहीं कर सका . लेकिन संस्कृत छन्द मेरा संस्कृत का ज्ञान न हो पर भी मेरे हृदय को आनन्दित करते .
चतुर्थ अंक के कुछेक छन्द पढ़ कर फिर सो गया ..पुनः तकरीबन रात आठ बजे उठा फ़ोन उठा कर देखा तो तकरीबन दर्जनों काल आई थी ..
कुछेक पिंकी और कुछेक नीतू की ।
मैंने नीतू को काल बैक किया ..
हैलो ….
हाँ
तुम फ़ोन क्यों उठा रहे थे ?
कुछ नहीं बस सोया हुआ था ..
अभी सोये थे , या बात करने का मन नहीं था ?
नहीं नहीं ऐसा कुछ नहीं है मैं सच बोल रहा हूँ ..
ओहो सच्ची ?
हीही चलो सही , कल कितने बजे मिल रहे हो ?
कल दिन में एक बजे मिलते हैं …
चलो सही है …
आई मिस यू डियर ..
टू यू …
गुड नाइट
टू यू
बाय
बाय बाय ..,
……
तभी पिंकी का फ़ोन आया …
हैलो
हाँ हैलो …
शाहजहाँ जी कहाँ व्यस्त थे …?
कहीं नहीं बोल फ़ोन क्यों किया ..?
कल चलना है चलेगा ..?
हाँ .कितने बजे जाना है ?
दस बजे जाएँगे घर से …
चल ठीक है ..।
ह्ममममम
रात भर यूँ ही पढ़ता रहा , सुबह चार बजे आँख लग गई टेबल ही में …
सुबह पिंकी का जब दस बजे फ़ोन आया तो …तब जा कर के उठा ।
जल्दी जल्दी तैयार हुआ और पिंकी का काम करा कर लक्ष्मी नगर छोड़ा गया और फिर नीतू से मिलने चल दिया ..
राजीवचौक पहुँचा ही था कि नीतू का फ़ोन आ गया..
कहाँ हो तुम ..?
मैं नहीं आ रहा हूँ मैंने उत्तर दिया…
सच बताओ ?
सच बोल रहा हूँ …
तब तक बात करते करते मैं उसी दुकान में जा पहुँचा जहाँ मिलने के लिए कहा था …
हाय हैलो हुई हम एक दूसरे को कई पल निहारते रहे फिर नीतू बोली –
गले नहीं मिलगे ??
तुम को सब कुछ मुझे बताना पड़ता है ..
और बताओ क्या हाल बना रखे हैं आपने ?
कुछ लिया करो …
बस पढ़ाई के कारण हैल्थ नहीं बन पा रही है ।
जैसे हम ने पढ़ाई की ही नहीं ना ?
वो मेरे लिए ढेरों गिफ्ट लाई थी मेरे लाख मना करने पर भी मुझे लेने पड़े गिफ्ट …और एक सुन्दर गुलाब का फूल ..और मैं खाली हाथ गया था ।
मैं बोला मैं तो तुम्हारे लिए कुछ नहीं लाया …
तुम आ गये वही मेरे लिए काफ़ी है …
तुम को देख कर मुझे जितनी ख़ुशी होती है ये तुम नहीं समझ पाओगे ,
तुम को पता है हर हफ़्ते की थकान मिटाने के लिए मैं हर संडे को हमारी कालेज की फ़ोटो देख कर आनंदित हो उठती …क्योंकि तुम को तो मेरी चिन्ता नहीं थी ..कभी फ़ोन तक नहीं किया …चलो छोड़ो ..।
क्या खाओगे ?
जो तुम को अच्छा लगे …
बस यूँ ही बातें करते रहे फिर अफगानी चाप आर्डर किया जो हम लोग कालेज के दिनों में खाया करते थे ।
जैसे ही बिल देने की बारी आई नीतू ने पे कार दिया …।
अब कहाँ चलना है चन्दर ?
तुम बताओ मुझे फिर घर भी जाना है ?
ओह्हहह मैं तुम्हारे लिए वहाँ से यहाँ आई हूँ तुम मेरे लिए एक दिन भी नहीं निकाल सकते हो ?
चलो बाबा मैं शाम तक तुम्हारे साथ हूँ , अब ख़ुश …
हाँ … इंडिया गेट चलते हैं पहले फिर देखते हैं ठीक है ?
हाँ …
मैं उस के साथ स्कूटी में पीछे बैठा और बस खुद को आज स्वतंत्र पक्षी जान रहा था ..इस पिछले एक साल से में बस किताबों और आँसुओं के साथ काटे थे दिन …।
लेकिन आज में अंदर से ख़ुश था . मैं कुछ पीछे हट कर बैठा था स्कूटी में नीतू ने उस को पकड़ कर बैठने को कहा तब कुछ आत्म ग्लानी भी हुई कि चन्दर तुझे चलाना आता तो बात ही अलग थी .
इंडिया गेट पहुँचे ..नीतू ने अपने बैग से एक गिफ्ट पैक निकाला और मुझे पकड़ा कर खोलने को कहा …
मैंने खोला तो उस में मेरी फेवरेट घड़ी थी .. मैं कालेज के दिनों में वैसी घड़ी चाहता था लेकिन महंगी होने की वजह से ख़रीद नहीं पाया ..।
और फिर घंटों इंडिया गेट के पास बैठे रहे ..और मुझे वो निहारती रही मैं उसे निहारता रहा , और आख़िर में नीतू ने पूछ ही लिया .।
तुम मुझ से प्यार करते हो ?
मैं कुछ डर कर बोला नहीं तो हाँ ..
तुम क्या कहना चाहते हो हाँ या ना ?
कुछ देर कुछ नहीं बोला मैं ..
बोलो ..
हाँ करता तो हूँ लेकिन मैं तुम्हारे लायक सही लड़का नहीं हूँ बस …
ओह्हहह तो मेरे लिए कौन सही है .?
मैं शादी करना चाहती हूँ तुम से ..
लेकिन मैं नहीं ,
लेकिन क्यों ? तुम को मैं पसंद नहीं ?
नहीं ऐसा कुछ नहीं है लेकिन मैं तुम से शादी नहीं कर सकता हूँ बस ..
मुझे तुम से ही शादी करनी है बस ,
तुम मेरे साथ मुम्बई चलो में तुम को किराये में घर में दिला दूँगा और तुम्हारी पढ़ाई में भी हैल्प ..ठीक है ।
मैंने अपने पापा से तुम्हारे बारे में सब कुछ बता रखा है …।और पापा को कोई परेशानी भी नहीं है …
तुम घर वालों से बात कर के मेरा साथ चलो अगले हफ़्ते …
नहीं नहीं …मैं नहीं आ सकता हूँ .,,
क्यों नहीं आ सकते हो , तुम चलो ये मेरा हुक्म है …तुम्हें चलना होगा वरना मैं भी शादी नहीं करूँगा …
मैं सोच के बताता हूँ ..,
मैं तो तुम से प्यार करती हूँ बस…
और मैं तो तुम से ये भी कह रही हूँ कि तुम को नौकरी करने की भी कोई ज़रूरत रहीं , मैं कर रही हूँ ..हम दोनों एक बन के ये जीवन जी सकते हैं और तुम को नौकरी भी करनी है तो भी सही मुझे तुम से प्रेम है समझे …।
और अगर लड़का कमा कर लड़की घर चला सकती है तो लड़की क्यों नहीं कमा सकती है ..
बस यूँ ही तू तू मैं मैं हुई .,.
अन्त में नीतू ने मुझ से आई लव यू कहलवा ही दिया ..
बस रात के आठ बजे तक घूमते रहे पूरी दिल्ली …
अब अलविदा कहने का मन नहीं था ..मेरा दबा प्रेम भी बाहर आ गया था …मुझे उस समय अजीब लगा जब नीतू ने कहा पापा का फ़ोन आ रहा है अब चलते हैं …नीतू मुझे छोड़ने प्रगति मैदान तक आई ,…

मैट्रो से निर्माण विहार तक और रिक्शे से घर आया …
घर पहुँचते – पहुँचते नौ बज गए थे … जैसे ही घर पंहुचा पापा आ धमके और बोले क्यों इतरी रात तक कहाँ था ?
कहाँ से आ रहा है ?
मैं कुछ नहीं बोला .।
मैं तुम से कुछ पूछ रहा हूँ .. मेरी मेहनत पर मजे लूट रहा है और आवारागर्दी कर रहा है , सब तेरी माँ की गलती है तुझे बिगड़ रखा है ..। मैं फिर भी कुछ नहीं बोला बस सिर झुकाये खड़ा रहा । तब तक माँ आ गई और बीच बचाव कर के ले गई … कभी बाहर तक नहीं जाता है एक दिन चला गया तो क्या लूटा दिया बेटे ने ?
बस यूँ ही तू तू मैं मैं हुई ..।
मैं अपने कमरे में चला गया , पुस्तकें उठाई लेकिन आज बिलकुल मन नहीं था पढ़ने का .. अलमारी के दराज में सिगरेट के कुछ डिब्बे पड़े थे , दरवाज़ा बंद कर रात भर सुलगाता रहा सिगरेट ।
ना जाने कब नीतू का फोन आया था मैं उठा भी नहीं पाया … रात के दो बजे तक सिगरेट पीता रहा … ।
मैं बस कर्तव्य से विमूढ़ हुआ जा रहा था .। क्या करूँ क्या नहीं .। और सिगरेट पीने की आदत मुझे सुधा के छोड़ जाने के बाद बनी । नीतू को भी पता था और उसके रहते मैंने छोड़ भी दी थी लेकिन फिर शुरू कर दी लेकिन अब नहीं रहा जाता था ..। बस चाहिए था …
दो बजे कमरे के फर्श में ही बेसुध हो गया , दिल बेचैन था , हृदय की गति दोगुनी हो गई . आँखों से अनायास ही अश्रु बहने लगे … । यूँ ही रोता रोता अचेतन हो गया .. रुदन का कारण भी मुझे पता नहीं था लेकिन दिल भर आता ..।
सुबह जब आँख खुली तो मैं मैक्स हॉस्पिटल में था , मेरे सिरहाने मेरी माँ बैठी थी , आँसुओं से तर ,… मैं जैसे ही होश में आया तो मैंने माँ से पूछा माँ मैं कहाँ हूँ ?
क्या हुआ है मुझे ?
माँ बोली कुछ नहीं हुआ है ..
तभी बहन आई बाहर से …
मुझे क्या हुआ है ?
तूने जो किया है वो हुआ है । माँ के लाख मना करने के बाद भी बहन ने सब कह सुनाया कि तू रात को पानी पीने के लिए नीचे आया तो तू फिसल कर अलमारी से जा टकराया तुझ से उठा नहीं गया जब पापा ने देखा तो पानी डाला मुँह पर लेकिन तुझ को होश नहीं आया तुझे फिर रात में ही यहाँ ले आए …।
और हाँ तेरी दोस्त का फ़ोन आया था नीतू का ..
तो तू ने फ़ोन उठाया ??
हाँ वो आ भी गई …नीचे गई है डाक्टर साहब से मिलने गई है ..
क्यों कितने बज गये हैं ?
दस बज गये हैं ..
नीतू को क्यों बताया तुम ने ??
क्यों क्या करती फिर .??
तब तक नीतू आ गई ..
क्या चन्दर क्या हाल बना दिए तुम ने ?
तुम्हारी रिपोर्ट देख के आयी हूँ .।तुम को हिमोग्लोविन ,और विटामीन -सी ,डी की कमी है अब तुम ने केवल स्वास्थ्य का ध्यान रखना है समझे ?
देखो बेटा तुम ही समझा सकती हो इस को खाना तो बहुत कम कर दिया है माँ बोली …
ह्मममम
तभी उस ने माँ के कान में कुछ कहा ..
माँ और नीतू बाहर चले गये …कुछ देर में लौटे तो माँ ने सिर पर हाथ फेरा और बोली –
बेटा तुम मेरी एक बात मानोगे ??
माँ आप बोलो …
आप की बात कभी मैंने नहीं मानी क्या ??
नहीं ..
लेकिन आज मान कर मेरे दूध का कर्ज़ उतार दे ..
माँ ऐसा मत बोल …तेरे लिए कुछ भी कर सकता हूँ ..।
तो तू नीतू के साथ मुम्बई चला जा ..
मैं न चाहकर भी कुछं नहीं बोल पाया …
नीतू से बात हुई कहा कि परसों चलना है …।
मैंने हाँ में उत्तर दिया .
हाँ चलो अभी मैं चलती हूँ …।
चलो ठीक है ..
घर जा कर सो गया .. अगली सुबह हुई । नया जीवन शुरू हुआ ।
जैसे ही आँखें खुली पापा को पाया ..
वो पापा जो मुझे हर बात के लिए ताने मारा करते थे मेर लिए चाय लिए खड़े थे …
ले चाय पी ले ..
अब कैसा लग रहा है तुझे ..?
थैंक्यू पापा ..
हाँ अब बेहतर हूँ .
कल तू मुम्बई जा रहा है , अपना समान बांध लेना ..।
हाँ पापा …
मैं सोच में पड़ गया पापा ने जिसे कभी सपोट नहीं किया कभी सही मुँह बात नहीं की अचानक ये क्या हो गया ..?
चमत्कार ही था मेरे लिए .. और मेरा मुम्बई जाना भी सार्थक क्योंकि जैसे माँ बाप बच्चों की खुसी के लिए करते हैं वैसे ही बच्चे भी माँ बाप की खुसी के लिए ही करते हैं वो बात अलग है कि ये उम्र नाजुक होती है कभी गलती भी हो जाती हैं वरना माँ बाप की खुसी कौन नहीं चाहेगा ..?
और सुन जाड़ों के दिन हैं ये ले पैसे अपने लिए कपडे ले आना , सफ़र में जाना है .।
नहीं मेरे पास पैसे हैं ..।
बेटे दे रहा हूँ ले ले ….
पापा कुछ पैसे टेबल में छोड़ कर ऑफिस को चले गए …।
तभी नीतू का फोन आया ..
कैसे हो ..?
ठीक हूँ ..
हाँ और कल की टिकट कन्फर्म हो चुकी है तुम को चलना है ..
हाँ ठीक है ..
और अब कैसी है तबियत ..?
पहले से बेहतर हूँ ……..।
ओके अपना ध्यान रखना ..
ह्म्म्म ..
ओके बाबा बाय बाय …
बाय ..
तभी बहन आ गई हाँ किस से बात कर रहा है दा ..?
किसी से नहीं बस दोस्त का फोन था ..
कौन दोस्त ..? कहीं नीतू तो नहीं ना ??
नहीं …हाँ …
हाँ मतलब ..?
क्या कह रही थी ..?
कुछ नहीं बस कल चलना है कह रही थी मुम्बई ..
तू सच में जा रहा है दा ..?
हाँ माँ ने कहा है और पापा भी खुस हैं तो जाना पड़ेगा ..
हाँ वो तो है लेकिन उस नीतू ने मम्मी पापा को क्या पट्टी पढाई पता नहीं .
क्या नीतू की पापा से बात हुई थी ?
हाँ सबसे पहले तो पापा से ही हुई थी और बहुत देर तक बात करते रहे और पापा नीतू की तारीफ भी कर रहे थे …।
हाँ और जाना पड़ेगा बैनु (बहन ) …
ठीक है भाई मेरे लिए कभी बाजार तक नहीं गया और उस के लिए मुम्बई सही है भाई …।
बस कर वही रहने के लिए नहीं जा रहा हूँ …। तू भी ना ..
यूँ ही बातों ही बातों में दिन का एक बज गया …
बस यूँ ही दिन से रात हो गई और मेरा जाने का दिन आ गया ..दिन में 3.45 की ट्रेन थी NZM Ltt (A. C.) वातानुकूलित एक्सप्रेस सेवा टिकट था 1725 /- रुपया जो पूर्व ही नीतू ने आरक्षित कर ली थी ..पापा उस दिन एक बजे घर आ गए और मुझे छोड़ने नई दिल्ली आये और छोड़ते समय बोले अपना ख्याल रखना .।
हाँ …….
पापा नमस्कार कह कर मैंने अलविदा कहा ..
जो मैं वहाँ सोया सुबह 6 बजे आँख खुली नीतू ने अपने कम्बल से मुझे ओडा रखा था ..।
गुड मॉर्निंग डिअर नीतू …
टू यू डिअर चंदर..
कहाँ पहुँच गए हम ?
नीतू ने कुछ नहीं नाम बताया जो मुझे याद नहीं और उस ने कहा कि 11 बजे पहुँच जायेंगे ..
अच्छा ..बस यूँ ही बातें करते न जाने कब मुम्बई आया ।
अन्धाधुंद भीड़ को चीरते हुए बाहर आए. टैक्सी बाले से पूछा नीतू ने …
भय्या हीरानंदनी एन्क्लेव चलोगे ..?
हाँ चलेंगे ना ..
15 मिनट में हम नीतू के one BHk रूम में पहुँच ..
हर दीवार पर मेरी फ़ोटो थी और कॉलेज की यादें .।
नीतू ने मेरे लिए कमरा ढूढ़ने का प्रयास किया लेकिन बहुत महँगा होने की वज़ह से (दिल्ली से दुगुने दाम हैं मुम्बई के ) नीतू ने कहा तुम कुछ दिन मेरे साथ ही रह लो ठीक है …?
हाँ ठीक है लेकिन तुम को कितना परेशान करूँगा मैं मुझे नहीं पता .. ।
परेशानी की कोई बात नहीं मुझ से ही प्यार किया है ना तुम ने ? और उससे अधिक मुझे दोस्त मानते हो ना ..?
नीतू तुम ही तो हो मेरे दोस्त और सब कुछ जो मुझे समझता है … और तो सुख में साथ थे ..।
बस यूँ ही दिन बीतते गए नीतू ने इस बीच कई दिन छुट्टी ली और पहले पेपर की तैयारी रात रात भर बैठ कर कराई ।
खुद रात को जागी रहती जब तक मैं जागा रहता … । और एक दिन भी मेरे सोने से पहले कभी नहीं सोती …। बस प्रोत्साहित करती जब मैं थक जाता मुझ से कहती बस अब सो जाओ कल करेंगे तैयारी । मैं एक मुस्कान के लिए लालायित रहता और वो मेरी वो इच्छा पूरी कर देती हँस कर ..। हम एक ही कमरे में रहे लेकिन कभी भी आज के टाइप के प्रेमियों जैसी फीलिंग नहीं आई मुझे ..। क्योंकि मैं आत्मिक प्रेम में विश्वास करता था जो नीतू जानती थी । इस लिए हम एक ही छत के नीचे थे …। सुबह को चाय लेकर आती और उसके साथ एक सुन्दर सी मुस्कान बस मेरे लिए ये कभी था ..। कई बार जब दिन में भी घर में होती तो नीतू मेरे ही साथ लगी रहती कि ये खा लो वो खा लो इन दिनों मेरे सेहत भी सही हो गई थी …।
मैं अक्सर कमरे में ही रहता लेकिन मुझे इस माँह की प्रतियोगिता दर्पण लेके आनी थी जो हर माँह नीतू ले के आ जाती थी ।
मैं बाहर निकला तो चौकीदार से पूछा – भय्या ये बुक की दुकान है आस – पास ?
हाँ है ना इस सोसाइटी के बाहर ही एक दुकान है …
थैंक्यू भय्या ..
ओके
यूँ ही दुकान से बुक देख रहा था बुक ली ..। दुकानदार ने पूछा भाई नए लगते हो कहाँ से हो ? और यहाँ कहाँ रह रहे हो ?
देल्ही से हूँ और इसी सोसाइटी में रह रहा हूँ ..।
कौन से नवम्बर के फ्लेट में रह रहे हो ?
c-45 ,
ओह्ह नीतू मैडम के साथ … नीतू मैडम तो कहती है सिंगल हूँ ..
हाँ सिंगल ही है नीतू ..
तो आप लोग लिविंग में रह रहे हैं …
भय्या आप को क्या लेना है , आप को बुक बेचनी है या कौन किस के साथ रह रहा है ये जानना है …
दुकानदार कुछ मुँह में ही बोला और बुक पकड़ा दी ..
मैंने पैसे पकड़ाये और मैं भी अपने रूम में आ गया ।
जब शाम को नीतू ऑफिस से आई तो मैंने सब कह सुनाया कि ऐसा ऐसा हुआ ।
नीतू मजाकिये अंदाज में बोली ..
कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना..।
नीतू हर परिस्थिती में एक सी रहती है मैंने ऐसी लड़की नहीं देखी अदम्य साहस है उस में ..।
मैं पुरुष हो कर टूट जाता लेकिन मेरे लिए मेरी नीतू हर बार गरधारी की तरह थी ..। अब मेरे हृदय में जो प्रेम था सात्विक था , जो भक्त और भगवान के मध्य होता है ..।
बस ऐसे ही दिन बीते पहले दो पेपर हुए .. उनका प्रतिफल आया में उत्तीर्ण था ..। अब मेन्स की तैयारियां करनी थी ।
जो तक़रीबन 6 माँह बाद था ..। नीतू ने दिन रात मेरे साथ लग कर मुझे पढ़ाया …। मैं अकेला होता तो कभी नहीं पढता लेकिन नीतू ने ही मुझ में अदम्य साहस भर दिया ..। अब मैं नहीं रोता हूँ .।
6 माँह के बाद मेन्स के सात पेपर हुए …।
उसका परिणाम घोषित हुआ .. मैं उत्तीर्ण था । अब जल्द ही साक्षात्कार की डेट तय हुई ..।
पापा का फोन आया बहुत खुस थे , माँ भी और बैनु भी ..।
बस ये मेरा खुसी का दिन ही नहीं बल्कि नीतू के खुसी का दिन भी था । मैं ही नहीं नीतू भी उत्तीर्ण हुई थी ।
इन कुछ महीनों में नीतू ने क्या कुछ नहीं सहा वो मैंने देखा ..
रात रात भर मेरे साथ जागना और मेरे लिए मुझ से पहले उठ कर चाय खाने की व्यवस्था कर के ऑफिस जाना ..। लेकिन एक बार भी मुझ से कुछ नहीं बोली .. एक माँ बाप भी अपने बच्चों के लिए इतना कुछ नहीं करते हैं ..।
कुछ ही समय में साक्षात्कार हुआ उस का परिणाम घोषित हुआ मैं उस में भी पास था । ये सब नीतू की ही देन थी ..। मुझ मिट्टी को हीरा बना दिया था उस ने .।
पापा फूले नहीं समए ।
पटाके फूटे मेरी दिल्ली में मेरी गली में ..।
मेरे जानने वाले जो भी थे जो मेरे घर रहते बेरोजगार रहते तरह – तरह की बातें करते थे आज वो ही कह रहे थे कि मैंने तो पहले ही कहा था ये कुछ अलग करेगा ..। बच्चा बचपन से ही होशियार था ।
अब मुझे कब मुम्बई से घर आऊ हो गई ..।
लेकिन नीतू ने कहा कि मैं भी चलूंगी देल्ही उससे पहले सन्डे को एक एक पार्टी होगी , उसके बाद चलेंगे देल्ही ..?
ओके नीतू …मैं बहुत खुस था । और मुझ से ज्यादा नीतू .।
और तुम को एक इंसान से मिलाना है जिस के कारण आज तुमने ये परीक्षा उत्तीर्ण की. ।
कौन है वो ..?
मैं कल तुम को उस से मिलाने वाली हूँ एक दिन का सब्र रखो ..।
अगले दिन नीतू जब ऑफिस से घर आई तो एक व्यक्ति साथ में था ..।
नीतू ने परिचय कराया .. ये सुधीर हैं जिन के कारण आज तुम यहाँ हो ..
लेकिन नीतू मैं तो इन को नहीं जानता हूँ ना ही मैं कभी मिला इन से ये मेरे लिए ये सब कुछ क्यों करेंगे ..?
मेरे तो कुछ हैं ना .. नीतू बोली
ये मेरे पति हैं हमारी शादी को एक साल से अधिक हो जाता है ..।
क्या तुम सच कह रही हो .. ? या मेरे साथ मजाक ..?
नहीं सच में ..
मुझ से प्रेम करती हूँ ऐसा क्यों कहा तुम ने ..?
मैं जब तुम को सब सच पहले बता देती तो तुम कभी भी ये परीक्षा पास नहीं कर पते ..। मैं जब तुम से मिलने दिल्ली आई थी तब ही मैं बताने वाली थी लेकिन तुम्हारी हालत देख कर मुझे बहुत बुरा लगा तब मैंने तुम्हारी मम्मी से बात की सुधीर से बात की और प्लान बनाया तुम्हारे लिए .।
और तुम्हारी माँ पापा को सब कुछ बता दिया था मैंने ।
तुम जब मुझ से प्रेम करती थी तो सुधीर से शादी क्यों की मैं ये जानना चाहता हूँ ..?
मेरी जॉब लग गई थी तो पापा ने मुझ से पूछे बिना मुझे एक दिन सुधीर से मिलाया और मुम्बई में ।
सुधीर के माता पिता देल्ही रहते हैं और पापा के साथ सुधीर के पापा काम करते हैं … । मैं मना कर रही थी शादी के लिए लेकिन पापा ने कहा मेरी खुसी इसी में है .. और मुझे सुधीर अच्छा भी लगा मैंने हाँ कर दिया …।
तुम पूजनीय हो नीतू ।
मैं तुम से सदा प्रेम करता रहूँगा ऐसे ही ..क्यों भाई सुधीर आप को प्रॉब्लम तो नहीं ना ..?
नहीं क्योंकि नीतू ने जैसा तुम्हारे बारे में बताया था तुम वैसे ही हो …।
तुम में इंसानियत है और नीतू पर विश्वास है इस लिए मैंने हाँ कहा तुम को साथ रखने के लिए और खुद दूर रहा नीतू से ।
मैं कुछ नहीं बोल पाया …और कुछ अटक कर बोला मैं आप का आजीवन आभारी रहूँगा ..।
बस यूँ ही बातें करते करते शाम हो गई और दूसरे दिन पार्टी हुई …बस में सुधीर नीतू .. अब मेरी सुधीर से भी अच्छी दोस्ती हो गई थी ,सुधीर अच्छे दिल का इंसान है ये नीतू ही नहीं मैं भी मानता हूँ । सोमवार को मुम्बई से ट्रेन थी हम तीनों दिल्ली आये । नई दिल्ली पर पापा लेने आ रखे थे और उन की ऑफिस की एक जमात भी जिन के कारण मुझे ताने सुनने को मिलते थे । पापा के आँखों में रौनक थी और पहली बार गले से भी लगया …।
बस ऐसी थी चन्दर की प्रेम कथा …। और ऐसी थी मेरी नीतू !!
माणिक्य बहुगुना

Author
Chandra Prakash
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