मेरा घर

ये घर मुझे अब बियाबान सा लगता है
अपना है फिर भी अनजान सा लगता है
जहां कभी जन्नत से नजारे थे
आज वही घर कब्रिस्तान सा लगता है
तारो वाली रात बीतती थी जिस छत पर
वो छत अब सुनसान सा लगता है
घर के बाहर की नेम प्लेट पर मेरा नाम
अब गुमनाम सा लगता है
मुझे मेरा घर अब किराये का मकान सा लगता है

झुर्रियों ने घेर रखा है मुझे
इसलिए आईने के सामने
अपना चेहरा भी अनजान सा लगता है
लोग कहते है भूतो ने घेर रखा है घर को
वो भूल गए है
इन भूतो के बीच इंसान ने अपना घरौंदा बना रखा है
लोग खामखाह बदनाम कर रहे हैं मेरे घर को
इसे तो मेरे घरवालो ने ही अनजान कर रखा है
मेरे मरने का इंतजार कर
मेरे घर को नीलाम करने का अरमान पाल रखा है—अभिषेक राजहंस

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