मेरा अस्तित्व

सच कहूँ तो इस कविता के माध्यम से मैंने अपने मन की अभिव्यक्तियों को व्यक्त करने का प्रयास किया है..सम्भवतः यही हर नारी के सन्दर्भ में उचित प्रतीत होता है ।

* मेरा अस्तित्व *

मैं और मेरा अस्तित्व,
कभी मुझसे ही पूछते..
क्या है मेरा अस्तित्व ?
क्या मेरा वजूद ?

मैं खुद से ही पूछती और खुद को बताती
आसमान में शून्य को जब मैं निहारती

तलाशती…मैं अपने वज़ूद को
मरुस्थल में प्यासा जैसे जल की बूंद को,
ढूंढती मैं भीड़ में खुद से खुद को
आखिर पा ही लेती अपने वजूद को,
झलकता मेरी आँखों में
कुछ ऐसे मेरा वजूद,
चमकता सूरज की किरण से
जैसे ओस की बूंद,

कभी तराशती मैं अपने वजूद को
कभी निखरती और सँवारती खुद को,
कभी टूटकर मैं बिखर जाती
और खुद ही स्वयं को समेट लाती,
कभी चमकती सितारों की मानिंद
कभी धरा की धूल बन जाती,

कभी झरने सी कल कल करती
कभी शान्त दरिया सी बहती,
कभी चंचल हिरनी बन जाती
और मृगनयनी बन कर इठलाती,
कभी फूलों की खुशबू बनकर
बगिया को अपने महकाती,
कभी चंदा की चाँदनी बनकर
शीतलता अपनी दे जाती,
कभी घटा बनकर बरसती
प्रेम की अपने वर्षा करती,
कभी प्रेयसी बन प्रिय को लुभाती
आँखों से प्रेम का सागर छलकाती,
हर रूप में अपनी परिभाषा बदलती
साथी के कदमों से कदम मिलाकर चलती,

जो बन जाती ममता की मूरत
भूल जाती मैं खुद को…
स्वयं को भूल कर मैं
निखारती अपने अंश के वजूद को,
देखती हूं जब भी मैं आईने में खुद को
हां…खुश हूं मैं पाकर अपने इस वजूद को,

है यही मेरी तपस्या, है यही जीवन मूल्य
अपनों को बना कर पूर्ण, होती मैं परिपूर्ण,
जैसे पाकर शून्य को, अंक हो जाते बहुमूल्य
शून्य है अपने आप में असीमित और अमूल्य,

है यही मेरा अस्तित्व,और यही मेरा वजूद
विधाता का दिया ये जीवन मेरा, है अमृत की बूंद….

प्रियंका सोनी 😊

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