मेघा

घिर – घिर आये मेघा चमके , बदरी में बिजुरी .
चंचल पवन उड़ाये रही – रही , गॊरी की चुनरी .
मेघा आये – दरस दिखाये , बिन बरसे चल जाये .
बादल उमड़ – घुमड़ कर गरजे , जानें क्या कह जाये .
किसानों से आँखमिचौली , खेले क्यों बदरी .
चंचल पवन उड़ाये रही – रही , गॊरी की चुनरी .
हरी – हरी चूड़ियाँ हाथ में मेहन्दी ,धानी चुनरिया .
नीम की डाली -झुला डाली , झूले संग सखिया .
झूले -झुलावे मिल कर गावे , सावन में कजरी .
चंचल पवन उड़ाये रही – रही , गॊरी की चुनरी .
मेघा बरसो पर ना बरसो , बाढ़ ही आ जाये .
दिन – दुखियों पर रहम करो , कहीं गाँव न छूट जाये .
छीजे छज्जा नाहीं टूटे , माटी की बखरी .
चंचल पवन उड़ाये रही – रही , गॊरी की चुनरी .
— सतीश मापतपुरी .

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