.
Skip to content

****में सोचने पर मजबूर हूँ ****

अजीत कुमार तलवार

अजीत कुमार तलवार "करूणाकर"

कविता

February 6, 2017

मैं सोचने पर मजबूर हूँ,
कि जमाना कहाँ जा रहा है
घर घर में भाई भाई को अब खा रहा है
रूख सब का बदल रहा है
रिश्तों को न जाने कौन डस रहा है !!

कुछ शंका में गुजर गए
कुछ को लोगो ने उजाड़ दिया
माँ ने प्रेमी के संग मिलकर
अब अपनी बेटी का बलात्कार करवा दिया !!

कैसा यह जनून है
प्रेम ने कर दिया अँधेरा ही अँधेरा
बीवी को लेकर अपने घर पहुंचा शोहर
सुहागरात से पहले ही उजाड़ गया सुहाग है !!

खुद ही फांसी पर झूल रहे
नहीं बस चलता तो रेल से हैं कट रहे
इंसानियत को अब आ रही शरम है
बेटो ने तो अपना पैदा करने वाला मरवा दिया !!

कैसे चलेगी दुनिया, कैसे बनेगा देश महान
युवा तो योवन के देहलीज से पहुँच रहा शमशान
आजकल के बूढें दिख रहे हैं नोजवान
युवाओं ने तो अपने हाथ से खुद को कातिल बना दिया !!

कवि अजीत कुमार तलवार
मेरठ

Author
अजीत कुमार तलवार
शिक्षा : एम्.ए (राजनीति शास्त्र), दवा कंपनी में एकाउंट्स मेनेजर, पूर्वज : अमृतसर से है, और वर्तमान में मेरठ से हूँ, कविता, शायरी, गायन, चित्रकारी की रूचि है , EMAIL : talwarajit3@gmail.com, talwarajeet19620302@gmail.com. Whatsapp and Contact Number ::: 7599235906
Recommended Posts
मशहूर हूँ
सुन के जग बालो की ,ये बातें सदा , सोचने के लिए अब में मजबूर हूँ। जिनते नजदीक आने की कोशिश कर, खुद को पता... Read more
क्षणिका
"क्षणिका" ------------------- पहले भी अजमाया था अब भी अाज़मा ले वैसे का वैसा हूँ जैसा पहले था अब भी वैसा हूँ क्या करूँ आदत से... Read more
नज़ारे नहीं नज़रिया बदल रहा हूँ
नज़ारे नहीं नज़रिया बदल रहा हूँ मेरा देश नहीं मैं बदल रहा हूँ नज़ारे नहीं नज़रिया बदल रहा हूँ मैंने भींच रखे थे मुट्ठी में... Read more
-: राज़-ए-मुश्कान :-
Sahib Khan गीत Dec 10, 2016
तुम्हारी नजरो की कसम, तुमपे फ़िदा हूँ मैं, लाख करू कोशिश विसाल की, मगर तुमसे जुदा हूँ मैं, तुम्हारी जुल्फों की कसम, बहुत मजबूर हूँ... Read more