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मेंहदी : मुक्तक

दिनेश एल०

दिनेश एल० "जैहिंद"

मुक्तक

July 10, 2017

मेंहदी
// दिनेश एल० “जैहिंद”

मैं कभी जंगलों में गुमसुम सोई थी ।
निज अनुपयोगिता पे छुपछुप रोई थी ।।
शुक्रगुजार हूँ मैं उन ऋषि-मुनियों की,,
उनकी नज़रों में जो कभी मैं आई थी ।।

मेरी शीतलता व कोमलता अपनाओ ।
मेरी लालिमा और मोहकता अपनाओ ।।
मेरे इन गुनों को अपनाकर जगत में,,
अपने प्रियवर पिया की प्यारी बन जाओ ।।

मैं मेहँदी बड़ी असरदार हूँ ।
रक्त वर्णा बहुत चटकदार हूँ ।।
मेरी पूछ बड़ी स्त्रियों में,,
मैं जो प्रिय उनका सिंगार हूँ ।।

=== मौलिक ====
दिनेश एल० “जैहिंद”
15. 06. 2017

Author
दिनेश एल०
मैं (दिनेश एल० "जैहिंद") ग्राम- जैथर, डाक - मशरक, जिला- छपरा (बिहार) का निवासी हूँ | मेरी शिक्षा-दीक्षा पश्चिम बंगाल में हुई है | विद्यार्थी-जीवन से ही साहित्य में रूचि होने के कारण आगे चलकर साहित्य-लेखन काे अपने जीवन का... Read more
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