गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

मृत्यु के बाद

मौत होते ऐ आदमी की आड़े सब किमै ऐ बदल जावै स,
जिसकै काँधे प थी जिम्मेदारी वो हे बोझ नजर आवै स।

चारपाई प तै फटदे सी तलै लुटां देवैं सं उसकै मृत शरीर नै,
नीचे तारै पाछै कोय ना उसकै मृत शरीर कान्ही लखावै स।

दिन छिपै पाछै दाग आवै ना, सारी रात आड़े कौण बैठैगा,
दिन छिपण तै पहल्यां ऐ दाग दे दयो, हर कोय सुझावै स।

जो काल ताहीं शक्ल बी देखना पसंद ना करया करदा,
आज मरै पाछै उसकी लाश नै मखमली कफ़न उढ़ावै स।

दाग दिये बिना तवा चढ़ै ना, बालक भूखे क्यूकर रहवैंगे,
अर्थी की करवाओ त्यारी आपस म्ह हर कोय बतलावै स।

सीधे श्मशान घाट म्ह ऐ पहुँच ज्यावैंगे रिश्तेदार थम चालो,
चिता प लुटाए पाछै देख लेगा जो आखरी दर्शन चाहवै स।

मुखाग्नि देये पाछै दो मुट्ठी राख की बन जावै स आदमी र,
दिन ब दिन भूल पड़ ज्या, औलाद बी रोवै लोग दिखावै स।

कुछ टैम बीते पाछै तै किसे के शक्ल बी ना याद रहंदी र,
बाहर आले तै दूर की बात औलाद बी ना जिक्र चलावै स।

सच्चाई का सबनै बेरा स आड़े फेर भी घमंड टुटदा कोणी,
कुछ ना जाणा गेल्यां आदमी कै सुलक्षणा याहे समझावै स।

©® डॉ सुलक्षणा अहलावत

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