गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

मृत्यु : एक पहेली

नियति ही भेजती है,क्या खुद आती है ,
मगर दोष सारा इंसानों पर मढ जाती है।

देखते ही देखते जीते जागते इंसान को ,
लोटा भर राख के ढेर में बदल जाती है।

क्या ! कब ! कैसे ! क्यों ? हे राम !
और एक आह जुबां पर छोड़ जाती है।

दबे पांव तू से धीरे से आती है कहा से ,
और रूह को तन सेे खींच ले जाती है ।

ख़ुदकुशी ,ह्त्या ,हादसा या असाध्य रोग,
बहाने कोई भी बना के तू आ ही जाती है ।

यह तो हम ही मूर्ख जगत की माया में फंसे,
तू अपना फर्ज बखूबी निभाने आ जाती है ।

हम दुहाई देते रहते खुदा और तकदीर को ,
तेल जितना दीए में।उतनी जलनी बाती है ।

कर आये आज किसी का दहन चिता पर ,
यही चिता तो सभी के लिए सजाई जाती है ।

इस नश्वर देह को सजाते संवारते हैं ता उम्र ,
और ये देह पल में राख का ढेर बन जाती है ।

हम जाने कितने अरमान पालके बैठे होते है,
और खुदाई हमारी नासमझी पर मुस्काती है ।

ना इन सांसों का कोई भरोसा न धड़कनों का ,
फिर क्यों महत्वकांक्षा इतना हमें दौड़ती है ।

यदि मुक्ति की चाह है आवागमन के दुख से,
तो इसे प्रभु भक्ति ही निजात दिलवाती है ।

यदि मृत्यु का भय मन में समाता प्राणी के ,
तो मात्र प्रभु-भक्ति ही इस भय से तारती है।

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