कविता · Reading time: 1 minute

मृगतृष्णा

दूर पर्वत पर
टिमटिमाते रोशनी की मानिंद
बुलाती हुई सी प्रतीत हो रही हैं
जीवन की खुशियाँ
और मैं
अभिमंत्रित सा
उस ओर खिंचता चला जा रहा हूंँ
लक्ष्य पर निगाहें टिकाए
चित्र – लिखित सा खिंचा चला जा रहा हूंँ
मगर
हाय !
कैसी विडंबना है ?
वो टिमटिमाती रोशनियाँ
और दूर होती चली गईं
एक छलावे प्रेत की भांति
मेरे निस्तेज चेहरे पे
तृष्णा की प्यास से आकुल
ढेर सारी कामनाएंँ लिए
टिकी हैं
वो आंँखें
अपने लक्ष्य पर
मैं निढाल सा
थका हारा रेगिस्तान के भटके
मुसाफ़िर की तरह
पड़ा हूंँ
और अब फिर वो
नज़र आ रही हैं वो टिमटिमाते रोशनियाँ
मेरे जीवन की खुशियां मृग मरीचिका बनी ।

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