मूर्तियों ने कभी नहीं कहा

मूर्तियों ने कभी नहीं कहा
जिन हाथों ने गढा मुझे
जिन हाथों ने किया खड़ा मुझे
उन हाथों को पकड़ो चूम लो
बाजुओं को पकड़ अपना सानिध्य दो
एक निवाला तुम खाओ एक निवाला
उनके मुंह को दो
मूर्तियों ने कभी नहीं कहा
औरत को मत रखने का अधिकार दो
सम्पत्ति में हक न देने पर
पिता – पति को धिक्कार दो
आधी आबादी को उनका आधा हक और अधिकार दो
जात पात की बेड़ी काटो, पानी वाणी में मधुर रस घोलो
मूर्तियों ने कभी नहीं कहा जन जन को
धन संचय का अधिकार दो
मूर्तियां चुप रहीं, जब से गढ़ी गई
जिस ने इन सब पे कुछ कहा
कुरीतियों के दीवार को ढाहा
उन्हें मूर्तियों में नहीं किताबों में खोजो
उनके शब्दों को गुणों मत उन्हें तुम पूजो
~ सिद्धार्थ

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मुझे लिखना और पढ़ना बेहद पसंद है ; तो क्यूँ न कुछ अलग किया जाय......
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