मुस्कुराता हूँ तो गम बढ़ता नहीं

मुस्कुराता हूँ तो गम बढता नही
डर से आंसू ही मेरा निकला नहीं

प्यार में रुसवा हो तो औरत ही क्यों
मर्द पे इल्जाम क्यों लगता नहीं

लूटने रहबर लगे गर काफिला
रास्ता कोई भी फिर बचता नहीं

कह दिया सो कर दिया पक्की जुबाँ
वायदे से पीछे वो हटता नहीं

बरगदों की छाँव मिलती गाँव में
पर वहां अब मैं कभी ठहरा नहीं

पत्थरों की ठोकरों से डर गया
आइना बाहर कभी निकला नहीं

माफ़ करना उसको मुश्किल तो न था
गर जुबाँ से जलजला उठता नहीं

अब यहाँ धोखा ही धोखा निर्मला
सच तुम्हारा काम अब आता नही

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निर्मला कपिला
निर्मला कपिला
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लेखन विधायें- कहानी, कविता, गज़ल, नज़्म हाईकु दोहा, लघुकथा आदि | प्रकाशन- कहानी संग्रह [वीरबहुटी],... View full profile
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