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मुसलमान : चार बीवियां-चालीस बच्चे!!! कितना सच-कितना झूठ?

आपको यह याद होगा कि जब देश की 2011 की जनगणना की रिपोर्ट जारी हुई थी तो मीडिया ने (जिसका एक बड़ा वर्ग आजकल पूरी तरह दक्षिणपंथी ताकतों के इशारे पर चल रहा है) उसे भ्रमात्मक अंदाज में पेश किया था जैसे देश को किसी खास एक वर्ग की ओर से भयानक संकट है. कहने का तात्पर्य यह कि देश की दकियानूसी-दक्षिणपंथी ताकतें घूम-फिरकर हर देश की हर नकारात्मक बातों के केंद्र में मुसलमानों को ले ही आती हैं. गाहे-बगाहे मुसलमान हमारे मन:पटल में खलनायक के तौर पर अंकित किए जाते हैं. बताया जाता है कि यह कौम जाहिल, दकियानूसी है. देश की फिजाओं में ‘मुसलमान’ शब्द को जहर की तरह घोला जा रहा है जिससे हम वैचारिक-सांस्कृतिक रूप से दम घुटा महसूस करें और फिर इससे राहत पाने के लिए इन्हीं दक्षिणपंथी फॉसिस्ट ताकतों की शरण में चले जाएं. गौवंश हत्या, तीन तलाक, उनकी बढ़ती जनसंख्या, आतंकवाद, पद्मावती के बहाने अलाउद्दीन खिलजी की चर्चा, ये सब बातें इसी षड्यंत्र का हिस्सा हैं.
जनसामान्य के दिमाग में कुछ बातें तथ्यों से परे किस तरह घुस जाती हैं कि उसका शिकार बुद्धिजीवी कहे जानेवाले पत्रकार, शिक्षक जैसा प्रबुद्ध वर्ग भी हो जाता है. हमारे एक पत्रकार साथी हैं जो जब-तब अपनी चर्चाओं में मुसलमानों को केंद्र में ले ही आते हैं. वे इस संदर्भ में बहुत ही अश्लील अंदाज में चर्चा करते हैं पर मैं यहां उनकी वह शैली नहीं रखना चाहूंगा. थोड़े शालीन शब्दों में यह कि ‘मुसड्डे… चार-चार बीवियां भईयाऽऽ और चालीस-चालीस बच्चेऽऽ. बाप परे बापऽऽ, क्या होगा इस देश का?’ इस तरह के विचार एक पत्रकार साथी के हैं. कुछ राजनेताओं का भी यही हाल है. विभिन्न मंचों से नेता और कथित संत-महंत, यहां तक कि साध्वियां भी मुसलमानों की जनसंख्या का भय दिखाकर हिंदू समाज की महिलाओं से दस-दस बच्चे पैदा करने का आह्वान करते हैं. मानों महिलाएं बच्चे पैदा करने की मशीन हों. अब ऐसे में जनसामान्य प्रभावित कैसे न हो?
लेकिन सच्चाई क्या है? सच्चाई और मिथक में जमीन-आसमान का अंतर है. चलिए हम थोड़ा बुद्धिजीविता का परिचय देते हुए आंकड़ों का वैज्ञानिक अध्ययन करें जो सरकारी तथ्यों पर ही आधारित हैं
यह बिल्कुल सच है कि 2001 में कुल आबादी में मुसलमान 13.4 प्रतिशत थे, जो 2011 में बढ़कर 14.2 प्रतिशत हो गए हैं. थोड़ा हम और पीछे भी जाते हैं. 1961 में देश में केवल 10.7 प्रतिशत मुसलमान और 83.4 प्रतिशत हिंदू थे, जबकि 2011 में मुसलमान बढ़कर 14.2 प्रतिशत हो गए और हिंदुओं के घट कर 80 प्रतिशत से कम रह जाने का अनुमान है. लेकिन यह हालत उतने ‘विस्फोटक’ नहीं हैं. सच यह है कि पिछले सालों में मुसलमानों की आबादी की बढ़ोतरी दर लगातार गिरी है. 1991 से 2001 के दस सालों के बीच मुसलमानों की आबादी 29 प्रतिशत बढ़ी थी लेकिन 2001 से 2011 के दस सालों में यह बढ़त सिर्फ 24 प्रतिशत ही रही. यहां यह विशेष ध्यान रहे कि कुल आबादी की औसत बढ़ोतरी इन दस सालों में 18 प्रतिशत ही रही. उसके मुकाबले मुसलमानों की बढ़ोतरी दर 6 प्रतिशत ज्यादा है. 1998-99 में दूसरे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के समय जनन दर हिंदुओं में 2.8 और मुसलमानों में 3.6 बच्चा प्रति महिला थी. 2005-06 में हुए तीसरे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार यह घट कर हिंदुओं में 2.59 और मुसलमानों में 3.4 रह गई थी. यानी औसतन एक मुस्लिम महिला एक हिंदू महिला के मुकाबले अधिक से अधिक एक बच्चे को और जन्म देती है तो जाहिर-सी बात है कि यह मिथ पूरी तरह निराधार है कि मुस्लिम परिवारों में दस-दस बच्चे पैदा होते हैं. इसी तरह, लिंग अनुपात को देखिए. 1000 मुसलमान पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की संख्या 936 है. यानी हजार में कम से कम 64 मुसलमान पुरुषों को अविवाहित ही रह जाना पड़ता है. ऐसे में मुसलमान चार-चार शादियां कैसे कर सकते हैं?
एक धारणा यह है भी बैठी हुई है कि मुसलमान परिवार नियोजन अपनाते. यह भी पूरी तरह गलत है. केवल भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में मुसलिम बड़ी संख्या में परिवार नियोजन को अपना रहे हैं. ईरान और बांग्लादेश ने तो इस मामले में कमाल ही कर दिया है. आज वहां जनन दर घट कर सिर्फ दो बच्चा प्रति महिला रह गई है यानी भारत की हिंदू महिला की जनन दर से भी कम. इसी प्रकार बांग्लादेश में भी जनन दर घट कर अब तीन बच्चों पर आ गई है.
यह परिवार कल्याण विभाग के आंकड़े हैं कि हमारे देश में 50.2 प्रतिशत हिंदू महिलाएं गर्भ निरोध का कोई आधुनिक तरीका अपनाती हैं, जबकि उनके मुकाबले 36.4 प्रतिशत मुस्लिम महिलाएं ऐसे तरीके अपनाती हैं. यह सच जरूर है कि भारत में मुस्लिम समाज की तुलना में हिंदू समाज परिवार नियोजन को कहीं अधिक तेजी से अपना रहा है. लेकिन यह भी सच उतना ही है कि मुसलमानों में भी परिवार नियोजन को अपनाने का रुझान तेजी से बढ़ रहा है. ुइस तरह जो भयावहता हिंदू कट्टरपंथियों की तरफ से बताई जाती है, वह गलत है.
(यह लेख मैंने उस समय फेसबुक पर पोस्ट किया था)

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