मुमकिन है

मुमकिन है कि ख़ुदा मिल जाए
जो ख़ुदा न मिले तो तुम मिल जाओ
तुम मेरे लिए ख़ुदा बन जाओ
मुमकिन है कि मोहब्बत फिर
किसी से हो जाए
दिल कहाँ अपना होता है
ये फिर किसी पर आ जाए
मुमकिन ये कहाँ की तुम्हे भूल जाऊं

चाहे जितने भी दर्द छिपाऊँ
दिल मे जो दफन है
उसे कभी आंखों से बहाऊँ
कभी कलम की स्याही बनाऊँ
मुमकिन ये कहाँ की
तेरे नाम की चादर मजार पर ना चढ़ाऊँ
संभलने की गुंजाइश कहाँ बची है
अब तो लडखडाने का डर लगा रहता है

मुमकिन है कि इश्क़ में मुझे ही दर्द मिला हो
पर थोड़ा सा शीशा तो तुम्हारे आईने का भी टूटा होगा
मुमकिन है की तुम मुझे ना चाहो
पर तेरा ख़ुदा तो चाहता होगा
मुमकिन है कि तुम मुझे भूलने की कोशिश करो
पर कुछ तो तुम्हारे आंखों में ठहरा होगा
आँसुओ के संग बहा दो मुझे
जो एक बार भी तुम्हे मुझसे इश्क़ न हुआ होगा–अभिषेक राजहंस

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