गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

मुनासिब न होगा!

हर बार नज़दीक आना मुनासिब न होगा!
अब सारी रस्मे निभाना मुनासिब न होगा!

माना की बहुत दर्द हैं इधर दिल में हमारे!
ज़ख्म सब को दिखाना मुनासिब न होगा!

एक रोज़ होंगी रुख़सत गम की स्याह रातें!
इस दिल को यूँ जलाना मुनासिब न होगा!

बहुत याद आती हैं हमें सब बातें तुम्हारी!
उन यादो को मिटाना मुनासिब न होगा!

गर सुन सको तो लबो की थिरकन सुनो!
धड़कनो को सुनाना मुनासिब न होगा!
#LafzDilSe By Anoop Sonsi

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