मुद्रा का अपमान..

सिक्के घर रख आइये, सबसे मिलता ज्ञान.
बाजारों में हो रहा, मुद्रा का अपमान..

मुद्रा के अपमान से, सिक्का रोये एक.
अब कोई लेता नहीं, कैसे हम दें फेक??

कहाँ इसे कर दें जमा, बैंक करें इनकार.
चिल्लर लेकर क्या करें, कैसे हो व्यापार??

गिनने से परहेज है, नित्य हो रही जंग.
बैंक हाथ करते खड़े, सिक्कों से सब तंग..

सिक्के लेने में करें, जो विरोध अतिरेक.
थैली भर-भर दे रहे, वे सब बैंक अनेक.

पब्लिक रहे दबाव में, बैंक रही है खेल.
सिक्कों के इस खेल में, जनता जाती झेल..

सिक्के क्योंकर ढालते, जब छप सकते नोट..
लेन-देन अति कष्टप्रद, लगती दिल पर चोट.

गारंटी देते नहीं, शायद दिल में खोट.
सिक्के ढाले जा रहे, नहीं छापते नोट..

हस्ताक्षर कर दे वचन, लगा गवर्नर चित्र.
सिक्कों को दें बंद कर, नोट छापिये मित्र..
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इंजी० अम्बरीष श्रीवास्तव ‘अम्बर’

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