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मुझे ज़िन्दगी तुम पढाते रहोगे…..

नज़र मुझसे यूँ ही मिलाते रहोगे,
मुझे ज़िन्दगी तुम पढाते रहोगे.
तुम्हारे ज़हन में हमेशा रहूंगा,
मुझे लिख के तुम जो मिटाते रहोगे
ये दुनिया तुम्हारे कदम चूम लेगी,
अगर तुम मुहब्बत लुटाते रहोगे.
ज़रा पूछ लो इन सियासत गरों से ,
कि मज़हब पे कब तक लड़ाते रहोगे.
कि साँसे कहाँ ले सकेंगे दुबारा,
हमे देखकर मुस्कुराते रहोगे.
दिलों में रहें हैं ठिकाने खुदा के
इमारत में कब तक बसाते रहोगे

………….सुदेश कुमार मेहर

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SUDESH KUMAR MEHAR
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ग़ज़ल, गीत, नज़्म, दोहे, कविता, कहानी, लेख,गीतिका लेखन. प्रकाशन‌‌--१. भूल ज़ाना तुझे आसान तो नही... View full profile
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