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मुझे मेरी सोच ने मारा

नही जख़्मो से हूँ घायल, मुझे मेरी सोच ने मारा ||

शिकायत है मुझे दिन से
जो की हर रोज आता है
अंधेरे मे जो था खोया
उसको भी उठाता है
किसी का चूल्हा जलता हो
मेरी चमड़ी जलाता है |
कोई तप कर भी सोया है,
कोई सोकर थका हारा ||

नही जख़्मो से हूँ घायल, मुझे मेरी सोच ने मारा ||

मै जन्मो का प्यासा हूँ
नही पर प्यास पानी की
ना रह जाए अधूरी कसर
कोई बहकी जवानी की
उतना बदनाम हो जाऊं
वो नायिका कहानी की|
सागर मे नहाता हूँ
मुझे गंगाजल लगे खारा ||

नही जख़्मो से हूँ घायल, मुझे मेरी सोच ने मारा ||

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शिवदत्त श्रोत्रिय
शिवदत्त श्रोत्रिय
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हिन्दी साहित्य के प्रति रुझान, अपने विचारो की अभिव्यक्ति आप सब को समर्पित करता हूँ|...