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मुझे चलना है बस चलने दो

शिवदत्त श्रोत्रिय

शिवदत्त श्रोत्रिय

कविता

October 4, 2016

मै राह चला हूँ प्रीत मिलन की
मुझे चलना है बस चलने दो ||

प्रीत लगी जब दिव्य ओज से
उस ओज मे जाकर मिलना है
मोह पतंगे को ज्वाला का
ज्योति मे जाकर जलना है
मन को निर्मल करने मे
तन जलता है तो जलने दो |
मै राह चला हूँ प्रीत मिलन की
मुझे चलना है बस चलने दो ||

हर एक बूँद का लक्ष्य नही
सागर मे विलीन हो जाना
जीवन दायिनि बनने के लिए
कुछ का घरा मे खो जाना
जीवन देने की चाहत मे
अस्तित्व खोता है तो खोने दो |
मै राह चला हूँ प्रीत मिलन की
मुझे चलना है बस चलने दो ||

शून्य से द्विगुणित होकर
हर अंक शून्य बन जाता है
श्याम विविर मे मिल करके
हर रंग श्याम बन जाता है
श्याम मिलन की चाहत मे
रंग ढलता है तो ढलने दो |
मै राह चला हूँ प्रीत मिलन की
मुझे चलना है बस चलने दो ||

दरिया को पार करने मे
पैरो पर कीचड़ लगता है
लेकिन पथिक कब राहो की
कठिनाइयो से डरता है
मिट्टी की इस काया पर
कीचड़ लगता है तो लगने दो |
मै राह चला हूँ प्रीत मिलन की
मुझे चलना है बस चलने दो||

Author
शिवदत्त श्रोत्रिय
हिन्दी साहित्य के प्रति रुझान, अपने विचारो की अभिव्यक्ति आप सब को समर्पित करता हूँ| ‎स्नातकोत्तर की उपाधि मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय प्रोद्योगिकी संस्थान से प्राप्त की और वर्तमान समय मे सॉफ्टवेर इंजिनियर के पद पर मल्टी नॅशनल कंपनी मे कार्यरत... Read more
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