Sep 9, 2016 · कविता
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मुझे अपनी मां से मुहब्बत है इतनी

मुझे अपनी मां से मुहब्बत है इतनी
मुझे अपनी मां से मुहब्बत है इतनी
मुझे अपनी मां से मुहब्बत है इतनी
मुझे अपनी मां से मुहब्बत है इतनी

जहां तक फलक की ये चादर तनी है
जहां तक ज़मी तेरी मौला बिछी है
ज़मीं से फलक तक जो वुसअत है इतनी
मुझे अपनी मां से मुहब्बत है इतनी
मुझे अपनी मां से मुहब्बत है इतनी

पहाड़ों को तोला तो हलके बहुत थे
समन्दर को नापा तो उथले बहुत थे
जो सूरज से पूछा तो कुछ भी न बोला
हवाओं के लब पे भी ताले बहुत थे
हरेक शय थी छोटी मुहब्बत बडी थी
कि मुझपर खुदा की इनायत है इतनी
मुझे अपनी मां से मुहब्बत है इतनी
मुझे अपनी मां से मुहब्बत है इतनी

जो हैं आसमा पर सितारे वो कम हैं
नज़र में हैं जितने नज़ारे वो कम हैं
दरख्तों ने फल जो उगाये वो कम हैं
जो सूरज को बख़्शे उजाले वो कम हैं
है जो कुछ निगाहों के आगे वो कम है
मुझे अपनी मां की ज़रुरत है इतनी
मुझे अपनी मां से मुहब्बत है इतनी
मुझे अपनी मां से मुहब्बत है इतनी

कोई मेरे दामन को दौलत से भर दे
कोई मुझको दुनिया का सुल्तान कर दे
कोई मुझको जन्नत की लाकर ख़बर दे
कोई शय मुझे इससे बढकर अगर दे
मिले मां के बदले तो हरग़िज़ न लूँगा
बताओ भला इनकी क़ीमत है इतनी
मुझे अपनी मां से मुहब्बत है इतनी
मुझे अपनी मां से मुहब्बत है इतनी

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Salib Chandiyanvi
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मेरा नाम मुहम्मद आरिफ़ ख़ां हैं मैं जिला बुलन्दशहर के ग्राम चन्दियाना का रहने वाला... View full profile
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