.
Skip to content

मुक्त छन्द रचना -कालजयी बन जाएँ

DrRaghunath Mishr

DrRaghunath Mishr

कव्वाली

May 8, 2017

कालजयी बन जाओ: एक यथार्थ परक मुक्त छन्द कविता-समीक्षार्थ:
अभी -अभी स्वानुभव पर आधारित,
विशिष्टतया नकारात्मक सोच वालों के नाम पाती.
विमर्श के लिए”
000
प्रतिक्रिया से बचने का डर
प्रति- प्रतिक्रिया की बुरी आदत
प्रतिक्रिया पर पाबंदी लगा देना
प्रश्न खड़े होते हैं-इनसे
किसी भी ऐसी क्रिति पर
क्रितिकार की सम्मति पर
क्रिति की मौलिकता पर
कथ्य-शिल्प -बुनावट पर
क्रितिकार की हर हरकत पर.

संभव है, ऐसे में, बहुत कुछ:
क्रिति को असली नहीं समझ
पढ़े ही नहीं उसे पाठक
क्रितिकार का नाम सामने आते ही
पढ़े बिना ही -बेकार मान ले
विमर्श में भड़क जाय जो
झगड़ जाय
सामान्य-सद्भाविक टिप्पणी पर
बिगाड़ ले सम्बन्ध
आलोचकों से
समीक्षकों से
पाठकों से
ख़ुद की कमियां उजागर होने पर
वर्षों से अर्जित.

नहीं हैं वे क्रितिकार-कलाकार
क्षरण जारी है उनका
क्रितिकार -कलाकार
ऐडमिन रूप में
सीखने -सिखाने
प्रतिक्रिया -आभार से परहेज
किसी से
सम्वाद करने में
ख़ुद को
छोटा समझने की भूल
अपने श्रिजन पर
इस्लाह को
अपमानित होना
समझने की आत्मघाती चूक
सामाजिक प्रतिष्ठामें -आलोचना को
मान लेना गिरावट
यथास्थिति वादी होना
मरण की ओर मोड़ देना है
ख़ुद के अंदर की प्रतिभा को
मत रोको अपना विकास सर्जको!
असली धारा में आओ
सीखो-सिखाओ
कद को नहीं घटाओ
कालजयी बन जाओ.

Author
DrRaghunath Mishr
डॉ.रघुनाथ मिश्र 'सहज' अधिवक्ता/साहित्यकार/ग़ज़लकार/व्यक्तित्व विकास परामर्शी /समाज शाश्त्री /नाट्यकर्मी प्रकाशन : दो ग़ज़ल संग्रह :1.'सोच ले तू किधर जा रहा है 2.प्राण-पखेरू उपरोक्त सहित 25 सामूहिक काव्य संकलनों में शामिल
Recommended Posts
कालजयी बन जाओ
कालजयी बन जाओ: एक यथार्थ परक मुक्त छन्द कविता-समीक्षार्थ: अभी -अभी स्वानुभव पर आधारित, विशिष्टतया नकारात्मक सोच वालों के नाम पाती. विमर्श के लिए" 000... Read more
मुक्त करो
आगे बढ़ना हमारी फितरत है , नाकामी हम जानते नहीं ,, फिर भी कुछ मुद्दों पर हम फेल हो गए यह फेल होना हमारे लिए... Read more
यह दीप उसी से जलता है
दें स्नेह मित्र बन प्रभु हमको, यह दीप उसी से जलता है| संदेह मुक्त होकर यह मन, बस प्यार बाँटता फिरता है || --इंजी० अम्बरीष... Read more
मदकलनी  छ्न्द
कलम घिसाई मदकलनी छ्न्द पर 11112 ,11112,11112,11112 *******†********†*********** पिक बयनी, मृग नयनी , मन बस जा ,मन हरषा। ससुर सुता , बन वनिता, उर रमजा,मत... Read more