Jan 2, 2017 · कविता
Reading time: 1 minute

.मुक्त छंद रचना: बेटी

माँ – बाप की
आँखों का नूर
पिता का
स्वाभिमान
समाज का
सम्मान
कल-कारखानों में
खेतों-खलिहानों में
दफ्तरों-विभागों में
कहाँ नहीं हैं
बेटियाँ हमारी
फिर क्यों
आखिर क्यों
जवाब दे समाज
सपष्टीकरण दे धर्म
बताएं-खोखली परम्पराएं
नज़रंदाज़ होती हैं क्यों
हमारी मासूम बेटियाँ
क्यों तिरस्कृत होती हैं
समाज के
खोखले रीति-रिवाजों में.
क्यों पराया धन
क्यों न अपनापन बेटों सा
क्यों
आखिर क्यों
भला क्यों
क्यों मानते हैं लोग
बेटों को
बाप की लाठी
बेटी को
घर का बोझ
बेटी नहीं होती बोझ
वह होती है
बाप का सहारा
पति का सर्वस्व
दो-दो परिवारों का अभिमान
बेटी है वरदान
बोझ न इसको मान
बोझ न इसको मान
दे इसको सम्मान
000
@-डॉ.रघुनाथ मिश्र ‘सहज’
अधिवक्ता/ साहित्यकार
सर्वाधिकार सुरक्षित

202 Views
Copy link to share
DrRaghunath Mishr
64 Posts · 4.2k Views
Follow 1 Follower
डॉ.रघुनाथ मिश्र 'सहज' अधिवक्ता/साहित्यकार/ग़ज़लकार/व्यक्तित्व विकास परामर्शी /समाज शाश्त्री /नाट्यकर्मी प्रकाशन : दो ग़ज़ल संग्रह :1.'सोच... View full profile
You may also like: