मुक्त छंद कविता

हंस की अंतर्ध्वनि :
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मैं खुश हूँ
000
जिन्दगी!
शुक्रिया तेरा
मुझे इंसान नहीं बनाया.
मैं खुश हूँ
इस रूप में
परमात्मा का भी
हार्दिक आभार
हंस हूँ मैं क्यों कि.
कर्म करके
खाता- जीता हूँ.
अपने तई
छीनना -लूटना-भिक्षावृत्ति
इंसान सा
मुझे / हम पशु- पक्षियों को नहीं सिखाया.
खुश हूँ
जिन्दगी!
मैं कभी भी पाप का
अपराध का
दुष्कर्म का
इंसान सा
दोषी
कदापि नहीं ठहराया जाता.
भाग्यशाली मानता हूँ
अपनेआप को
गर्व है मुझे खुद पर
अपनी बिरादरी पर
कभी लांछन नहीं लगता हम पे
हमें लांछन लगाना
परमात्मा ने नहीं सिखाया
वो तो किसी को कुछ भी
कभी नहीं सिखाता.
मनुष्य में
विवेक है
मन- चित्त- बुद्धि- अहंकार है
उनका उपयोग
जैसा चाहे कर सकता है
अच्छा- बुरा दोनों.
प्रकृति!
कभी किसी को नहीं रोकती
कुछ भी करने से
जो जैसा करता है
स्वतः ही
मिलता है – नतीजा
हर कर्म का
स्वाभाविक.
जिन्दगी!
शुक्रिया तेरा
न जाने
क्या होता मैं
अगर कहीं इंसान होता
इंसान योनि में भी
इंसान!
शायद असल इंसान नहीं.
सुना है इंसान
अभी
पशु मानव से
इंसान बनने की प्रक्रिया में है
अर्थात प्रगति की राह में
जीवन की कश्ती में
भवसागर में
हिचकोले खा रहा है.
बेचारा इंसान
सिर्फ अपने कर्मों से
अपने संस्कारों से
तकलीफें भोग रहा है
भोगेगा
जब तक संस्कार
पूरी तरह धुल नहीं जाते
मन का नियमन नहीं हो जाता
सद्कर्मों-मानवोचित व्यवहारों से
क्षमा- दया- करुणा – सहयोग
आपसी सद्भाव- भाई चारे से.
अहा !
मैं हंस हूँ
खुद्दारी में
उदाहरण दिया जाता है मेरा
मेरिटोरियस होता हैं हंस हमेशा
भाग्यशाली हूँ
मैं खुश हूँ
इंसान नहीं
हाँ !इंसान नहीं
इंसान- जिसके कर्मों से
दुनियां
भव्यता – वैज्ञानिक उपलव्धियों सहित
गिरावट की ओर भी , अग्रसर है
हद से अधिक
बर्वादी -तबाही -प्राकृतिक आपदाएं
तय है
यदि
नहीं रुका
यह
गिरावट का अटूट सिलसिला.
जिन्दगी!
शुक्रिया तेरा
इश्वर!
आभार तेरा
मैं पक्षी हूँ
इंसान नहीं.
000
@डॉ.रघुनाथ मिश्र ‘सहज’
अधिवक्ता /साहित्यकार
सर्वाधिकार सुरक्षित

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डॉ.रघुनाथ मिश्र 'सहज' अधिवक्ता/साहित्यकार/ग़ज़लकार/व्यक्तित्व विकास परामर्शी /समाज शाश्त्री /नाट्यकर्मी प्रकाशन : दो ग़ज़ल संग्रह :1.'सोच...
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