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मुक्ति, युक्ति और प्रेम

दिनेश एल०

दिनेश एल० "जैहिंद"

कविता

November 13, 2017

मुक्ति, युक्ति और प्रेम
// दिनेश एल० “जैहिंद”

हो तुम कितनाहुँ बड़े कर्मयोगी ।।
हो तुम कितनाहुँ बड़े धर्मयोगी ।।
जनम-मरण के बीच लटके रहो,,
बने रहो तुम सदाही भुक्तभोगी ।।

तुमसे परे सदा तुम्हारी मुक्ति ।।
कितनाहुँ करते रहो तुम युक्ति ।।
ये जीवन-चक्र ईश्वरीय प्रबंधन,,
ईश्वरीयीक्छा है सर्वोच्च शक्ति ।।

है यहाँ सब प्रपंच सर्वत्र पाखंड ।।
प्रेम है मूलमंत्र दृष्टिगत अखण्ड ।।
प्रेम प्रेरणा-प्रेम खुदा-प्रेम इंसान,,
प्राण संग यही मिला प्रेम-डण्ड ।।

प्रेम से रहो प्रेम करो प्रेम बाँटो ।।
प्रेम से जीतो व प्रेम से ही हारो ।।
प्रेम से ही तेरे ईश्वर दौड़े आएंगे,,
प्रेम ही है परमात्मा मानो यारो ।।

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दिनेश एल० “जैहिंद”
22. 07. 2017

Author
दिनेश एल०
मैं (दिनेश एल० "जैहिंद") ग्राम- जैथर, डाक - मशरक, जिला- छपरा (बिहार) का निवासी हूँ | मेरी शिक्षा-दीक्षा पश्चिम बंगाल में हुई है | विद्यार्थी-जीवन से ही साहित्य में रूचि होने के कारण आगे चलकर साहित्य-लेखन काे अपने जीवन का... Read more
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