मुक्तक · Reading time: 1 minute

मुक्तक

सुरभित शीत बयार,घन गरजे चपला संग,
आने को बरसात, विरहनी भरा मन उमंग।
ताड़-तरु खग-विहग संग पूर्वा,लगी गाने,
कूके कोयल, मोर, प्रकृति भी नाचे संग-संग।
नीलम शर्मा ✍️

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