मुक्तक

मुक्तक त्रय

“जश्न-ए-आज़ादी”

(1)
जश्न आज़ादी मनाएँ नेह वंदन भारती!
देश के प्रहरी सजाएँ भाल चंदन भारती!
गूँज शहनाई भरें उन्माद हिंदुस्तान में-
देश के ख़ातिर समर्पित जान-तन-मन भारती!

(2)
केसरी बाना पहन कर काफ़िले सजते रहें।
हौसले दीवानगी के नित नए दिखते रहें।
रख तमन्ना सरफ़रोशी की तिरंगा हाथ ले-
दुश्मनों पर टूट कर इतिहास हम रचते रहें।

(3)
शौर्य गाथा कह रही शमशीर हिंदुस्तान की।
भूल मजहब हम बनें तस्वीर हिंदुस्तान की।
तोड़ बंधन नफ़रतों के रंग बलिदानी सजा-
हम लहू देकर लिखें तकदीर हिंदुस्तान की।

डॉ. रजनी अग्रवाल ‘वाग्देवी रत्ना’
वाराणसी (उ. प्र.)
संपादिका-साहित्य धरोहर

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