मुक्तक

अमीरी नर्म बिस्तर पर गुजारे शौक़ से जीवन।
ठिठुरती रात में बेबस पड़ा फुटपाथ पर निर्धन।
कराहा कर्ज से जितना सताया सर्द ने उतना-
कहर बरसा रही है शीत लहरी ठंढ़ की ठिठुरन।
-लक्ष्मी सिंह
नई दिल्ली

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