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मुक्तक

DrRaghunath Mishr

DrRaghunath Mishr

मुक्तक

December 30, 2016

हों ऐसे हम खिले-खिले।
हों न कभी हम हिले-हिले।
नए वर्ष – अभिनन्दन में,
ढहें द्वेष के सभी किले।
@ डा०रघुनाथ मिश्र ‘सहज’
अधिवक्ता /साहित्यकार
सर्वाधिकार सुरक्षित

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Author
DrRaghunath Mishr
डॉ.रघुनाथ मिश्र 'सहज' अधिवक्ता/साहित्यकार/ग़ज़लकार/व्यक्तित्व विकास परामर्शी /समाज शाश्त्री /नाट्यकर्मी प्रकाशन : दो ग़ज़ल संग्रह :1.'सोच ले तू किधर जा रहा है 2.प्राण-पखेरू उपरोक्त सहित 25 सामूहिक काव्य संकलनों में शामिल
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