मुक्तक

कड़कड़ाती ठंड में वो काँपते नंगे बदन।
भूख से बेकल हुए क्यों आज ये मासूम मन।
पात्र भिक्षा का लिए बचपन खड़ा है राह में-
दृश्य ऐसा देख कर अश्रु से भींगे नयन।
लक्ष्मी सिंह
नई दिल्ली

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