मुक्तक

“तिरंगे की कसम”
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#तिरंगे की कसम खाकर महकती छोड़ आया मैं।
पहन #राखी हथेली में चहकती छोड़ आया मैं।
लगा #सिंदूर माथे पर दिए आँसू चला आया-
कलेजा चीरती #ममता सिसकती छोड़ आया मैं।

लगा कर धूल मस्तक पर चला दुश्मन मिटाने को।
#वतन काशी वतन क़ाबा वतन पे जाँ लुटाने को।
#शहादत के लिए जज़्बा नहीं अब होश बाकी है-
बढ़े जो हाथ उनको काट कर जननी बचाने को।

किया आगाज़ बैरी ने नया संग्राम लिख दूँगा।
बहीं जो खून की नदियाँ नया अंज़ाम लिख दूँगा।
सुनी जो #चींख घाटी में नहीं खामोश बैठूँगा-
मिटा हस्ती ज़माने से वतन के नाम लिख दूँगा।

#सुलाकर गोद पूतों को तड़प ममता सहा करती।
सुलगती आग चिंगारी नमी बनकर बहा करती।
रखा महफूज़ भारत को बिछा दीं लाश #सरहद पर-
किया #कुर्बान बेटे को तरसती माँ रहा करती।

डॉ. रजनी अग्रवाल “वाग्देवी रत्ना”
वाराणसी (उ. प्र.)
संपादिका-साहित्य धरोहर

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