मुक्तक

मुक्तक

इश्क में इश्क ने हम पर रुआब रक्खा है।
हरेक सवाल का हमने जवाब रक्खा है।
जुबाँ ख़ामोश है लब मुस्कुरा रहे अपने-
ढहाए जुल्मो सितम का हिसाब रक्खा है।

डॉ. रजनी अग्रवाल ‘वाग्देवी रत्ना’

ख़्वाब आँखों ने बुने उनको चुराकर देखले।
आँख से आँसू बहे उनको छिपाकर देखले।
एक तू अहसान इतना आज कर ए दिलरुबा-
याद में मेरी कभी ख़ुद को भुलाकर देखले।

डॉ. रजनी अग्रवाल ‘वाग्देवी रत्ना’

सीखले कुछ इस जहाँ से आज़माना छोड़ दे।
भूलकर हैवानियत नफ़रत लुटाना छोड़ दे।
बेचकर बैठा यहाँ इंसानियत हर आदमी-
कर्ज़ रिश्तों का निभा किश्तें चुकाना छोड़ दे।

डॉ. रजनी अग्रवाल ‘वाग्देवी रत्ना’

तुम्हारी चाहतों के गुल फ़िजा में मुस्कुराते हैं।
तुम्हारे साथ के लम्हे हमें जीना सिखाते हैं।
शजर से टूटकर बिखरे सभी पत्ते यहाँ सूखे-
नई उम्मीद के दीपक तमस में जगमगाते हैं।

डॉ. रजनी अग्रवाल ‘वाग्देवी रत्ना’

द्वेष, चिंता, ईर्ष्या में जल रहा इंसान है।
नफ़रतों से जोड़ रिश्ता ढल रहा इंसान है।
पा मनुज चोला यहाँ हैवानियत के बीज बो-
बेचकर ईमान ख़ुद को छल रहा इंसान है।

डॉ. रजनी अग्रवाल ‘वाग्देवी रत्ना’

आशिकी में दिल लगाया प्यार पाने के लिए।
यार ने रुस्वाइयाँ दीं खुद रुलाने के लिए।
भूलकर शिकवा शिकायत कर रही हूँ मैं दुआ-
जो मुहब्बत था मेरी उसको जिताने के लिए।

डॉ. रजनी अग्रवाल ‘वाग्देवी रत्ना’

लगाकर आग मजहब की जलादीं बस्तियाँ देखो।
सियासत मुल्क में करते ज़रा खुदगर्ज़ियाँ देखो।
छिपाकर नोट लेते हैं बिकाऊ खून है सस्ता –
सिसकती लाज बहनों की लगादीं बोलियाँ देखो।

डॉ. रजनी अग्रवाल ‘वाग्देवी रत्ना’
धमाचौकड़ी, चोर-सिपाही बचपन याद दिलाते हैं।
भीगा आँचल, सौंधी खुशबू आँगन को ललचाते हैं।
पहल-दूज, खट्टी अमियाँ को मन मेरा अकुलाता है-
झूला, कजरी, मेला, सावन मुझको बहुत रुलाते हैं।

डॉ. रजनी अग्रवाल ‘वाग्देवी रत्ना’
वाराणसी(उ. प्र.)
संपादिका- साहित्य धरोहर

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