मुक्तक

चला जाऊँ अगर तन्हा नहीं कोई गिला होगा।
तुम्हारे रूँठ जाने का नहीं फिर सिलसिला होगा।
हज़ारों महफ़िलें होंगी मगर मुझसा नहीं होगा-
वफ़ा चाहूँ अगर तुमसे कहो क्या फ़ैसला होगा।

डॉ. रजनी अग्रवाल ‘वाग्देवी रत्ना’

बंद मुठ्ठी लाख की किस्मत बनाने आ गए।
भूख सत्ता की जिसे उसको हटाने आ गए।
है नहीं इंसानियत, ईमान दुनिया में बचा-
हम फ़रेबी यार को दर्पण दिखाने आ गए।

डॉ. रजनी अग्रवाल ‘वाग्देवी रत्ना’

दिलों में पालकर नफ़रत सियासत लोग करते हैं।
लड़ाते नाम मज़हब के शरारत लोग करते हैं।
कवायद, पैंतरे,फ़ितरत यहाँ नीले सियारों से-
लहू पीकर सताने की हिमाक़त लोग करते हैं।

डॉ. रजनी अग्रवाल ‘वाग्देवी रत्ना’

हमें दिल में बसाकर तुम निशाना क्यों बनाते हो।
सजाकर गैर की महफ़िल हमें तुम क्यों जलाते हो।
वफ़ा की आड़ में हरदम चलाए तीर लफ़्जों के-
इबादत की सदा हमने हमें क्यों आजमाते हो।

डॉ. रजनी अग्रवाल ‘वाग्देवी रत्ना’

अधर के सुर्ख प्यालों से पिया जो जाम ना होता।
हमारे कत्ल का तुम पर कभी इल्ज़ाम ना होता।
चलाकर तीर नज़रों से न जो घायल किया होता-
सरे चर्चा हमारा नाम यूँ बदनाम ना होता।

डॉ. रजनी अग्रवाल ‘वाग्देवी रत्ना’
वाराणसी (उ. प्र.)
संपादिका-साहित्यधरोहर

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