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मुक्तक

ज़माने का कैसा चलन है निराला,
वही काटते सिर जिन्हें हमने पाला,
निगेहवान समझे थे जिसको वतन का,
अब वतन को हमारे वही बेच डाला,

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jwala jwala
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Singrauli
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kavyitri