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मुक्तक

हेमा तिवारी भट्ट

हेमा तिवारी भट्ट

मुक्तक

November 23, 2016

“आखिर कोई कितना रोए
अश्रु से दुख क्यों भिगोए
भारी होते भीग भीग कर
दुखड़े हैं रूई के फोहे

चलो हँसी की हवा चलाएँ
भीगे हैं गम उन्हें सुखाएँ
मन की पीड़ा हल्की होगी
तितली जैसे पंख फैलाएँ”

✍हेमा तिवारी भट्ट✍

Author
हेमा तिवारी भट्ट
लिखना,पढ़ना और पढ़ाना अच्छा लगता है, खुद से खुद का ही बतियाना अच्छा लगता है, राग,द्वेष न घृृणा,कपट हो मानव के मन में , दिल में ऐसे ख्वाब सजाना अच्छा लगता है
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