मुक्तक

जो चरागों से रौशन दुआरे रहे
वो हमारे नहीं वो तुम्हारे रहे
जिनके चहरे पे चहरों का था आवरण
वो ज़माने में अक्सर सितारे रहे

12 Views
A poet by birth...A CA by profession...
You may also like: