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मुक्तक

Rishav Tomar (Radhe)

Rishav Tomar (Radhe)

मुक्तक

August 11, 2017

कही नफरत कही चाहत कही मुश्किल जमाने में
खुदा का नूर बसता है गजल औऱ गीत लिखने में
मैं कैसे लिख दूँ तुमको रात मेरी ज्योत्स्ना बतला
कि हर एक रंग छुपाता है तेरे रुख के नकाबों में

कोई कैसे समझ पाता मोहबत को इबादत को
अभी हम खुद नही समझे हसीं की इबादत को
बताओ कैसे समझाये बताओ कैसे बतलाये
कि हर एक पल गुजरता है यहाँ रोटी कमाने को

ये कैसा दौर है कि सदाकत गुम है मेरी जाँ
हँसी के घर मे भी साथी यहाँ गम है मेरी जाँ
कोई कैसे निभाये चाह में कसमो रिवाजो को
यहाँ दिल तोड़ने का रोज का फैसन है मेरी जाँ

गुजरी उम्र सारी बाप ने इज्जत कमाने में
गुजरी उम्र ये हमने ये यहाँ रोटी कमाने में
वहाँ गम का कभी राधे कोई साया नही आया
बुजर्गों की कदर रहती है जिसके आशियाने में

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Author
Rishav Tomar (Radhe)
ऋषभ तोमर अम्बाह मुरैना मध्यप्रदेश से है ।गणित विषय के विद्यार्थी है।कविता गीत गजल आदि विधाओं में साहित्य सृजन करते है।और गणित विषय से स्नातक कर रहे है।हिंदी में प्यार ,मिलन ,दर्द संग्रह लिख चुके है

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