मुक्तक

मुक्तक
(१)”मुहब्बत”
दिखा जो चाँद नूरानी तिरे दीदार को तरसा।
सजाकर ख़्वाब आँखों में तसव्वुर यार को तरसा।
मुहब्बत ने किया घायल हुआ दिल आज पत्थर है।
किया कातिल निगाहों ने जहां में प्यार को तरसा।
डॉ. रजनी अग्रवाल “वाग्देवी रत्ना”

(२)समाकर रूप तन-मन में सनम तुम बाँह में आओ।
सजा कर रात वीरानी बने तुम स्वप्न मुस्काओ।
नयन से जाम छलका कर मधुर अधरों को सरसाओ।
नहीं खुशबू सुहाती है कहे रजनी चले आओ ।
डॉ. रजनी अग्रवाल “वाग्देवी रत्ना”

“आतप”
(३)आँचल शूल दिखाय कहे इस तप्त धरा पर नेह लुटाओ।
प्रीत बनो सुख बाँह पसारत द्वेष भुला निज ठौर बिठाओ।
कंटक सा नित रूप धरो नहि कोमल देह धरै मुसकाओ।
दादुर मोर पुकार कहे अब निष्ठुर मेघ हमें दुलराओ।
डॉ. रजनी अग्रवाल “वाग्देवी रत्ना”
महमूरगंज, वाराणसी

“ख़्वाहिश”
(४)ख़्वाहिश खुद को सनम से मिलाने की है।
अतीत की याद में गुनगुनाने की है।
एक बार फ़िर रूठने-मनाने की है।
मुहब्बत में हद से गुज़र जाने की है।
डॉ. रजनी अग्रवाल “वाग्देवी रत्ना”

“बेखुदी”
(५)मुहब्बत में नज़र फिसली, दिले नादान ना माना।
बसाया रूप आँखों में लुटाया प्यार दीवाना ।
निगाहें फेरकर उसने दिखाई बेरुखी अपनी।
जिऊँ कैसे बिना उसके नहीं आसां भुला पाना।
डॉ. रजनी अग्रवाल “वाग्देवी रत्ना”

विषय “समर्पण”
(६)चला मैं आज सजधज के तिरंगा ओढ़ के प्यारा।
किया श्रृंगार माता ने सुलाया गोद में यारा।
वतन पे जाँ फिदा कर दूँ यही ख्वाहिश सुहानी है।
समर्पण का धरम तुम भी निभाना शौक से न्यारा।
डॉ. रजनी अग्रवाल “वाग्देवी रत्ना”

(७)दिखाके बेरुखी चिलमन गिराके बैठे हैं ।
मिजाज़े बादलों सा रुख बनाके बैठे हैं।
बुलाऊँ पास तो कैसे बुलाऊँ यारों मैं
हिना की हसरतें पाँवों लगाके बैठे हैं।
डॉ. रजनी अग्रवाल “वाग्देवी रत्ना”

मुक्तक “आफ़ताब”
(८)खिलाकर आफ़ताबी मुख किया घायल हज़ारों को ।
छिपा कर रुख नकाबों में किया रुस्वा बहारों को।
तुम्हारे रूप के सदके लुटादूँ चाँद तारों को।
कहो मुमताज फिर इक ताज दे दूँ मैं नज़ारों को ।
डॉ.रजनी अग्रवाल “वाग्देवी रत्ना”

(९)बिखेरे रंग बारिश के, उड़ी तितली सी मैं फिरती।
अदाएँ शोख चंचल चाँद, चितवन चैन मैं हरती ।
सजन की बाँह इठला कर, महक तन मन मधुर छाई।
चुरा कर रूप फूलों से निराली प्रीत में बनती।
डॉ. रजनी अग्रवाल”वाग्देवी रत्ना”

(१०)निगाहों के झरोखे से मुहब्बत झाँक लेती है।
हँसी की आड़ में बैठी उदासी भाँप लेती है।
बहा कर आँख से आँसू समंदर खार कर डाला।
लगा हर राज़ पर पहरा पलक जब ढाँक लेती है।
डॉ.रजनी अग्रवाल “वाग्देवी रत्ना”

(११)चली जब लेखनी मेरी, किया अल्फ़ाज़ ने घायल।
धुआँ ,स्याही बनी धड़कन हुआ जज़्बात से कायल।
नहीं समझा नमी कोई नयन को देख कर मेरे।
सुनी झंकार गैरों ने बजी जब प्रीत की पायल।
डॉ. रजनी अग्रवाल “वाग्देवी रत्ना”

(१२)डुबो कर दर्द में मुझको हँसाने कौन आया है?
चुभा कर शूल आँचल में खिलाने कौन आया है?
मिले जो ज़ख़्म उल्फ़त के दिखाऊँ मैं उन्हें कैसे?
लगाने आज मरहम प्यार की फिर कौन आया है?
डॉ. रजनी अग्रवाल “वाग्देवी रत्ना

(१३)अकेला साथ को तरसूँ नहीं खुशबू सुहाती है।
चुभाए शूल चाहत में नहीं सूरत लुभाती है।
चिढ़ाता आइना मुझको लगा कर प्रीत का सुरमा।
घुटन साँसें सहा करतीं मुहब्बत आजमाती है?
डॉ. रजनी अग्रवाल “वाग्देवी रत्ना”
संपादिका-साहित्य धरोहर
महमूरगंज वाराणसी (मो.-9839664017)

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