.
Skip to content

मुक्तक

MITHILESH RAI

MITHILESH RAI

मुक्तक

May 18, 2017

कबतक जी सकूँगा नाकाम होते होते?
कबतक जी सकूँगा गुमनाम होते होते?
भटक रहा हूँ तन्हा मंजिल की तलाश में,
कबतक जी सकूँगा बदनाम होते होते?

#महादेव_की_कविताऐं’

Author
MITHILESH RAI
Recommended Posts
मुक्तक
होते ही शाम तेरी प्यास चली आती है! मेरे ख्यालों में बदहवास चली आती है! उस वक्त टकराता हूँ गम की दीवारों से, जब भी... Read more
दूरी बनाम दायरे
दूरी बनाम दायरे सुन, इस कदर इक दूजे से,दूर हम होते चले गए। न मंजिलें मिली हमको, रास्ते भी खोते चले गए। न मैं कुछ... Read more