कविता · Reading time: 1 minute

मुक्तक

ये दिल निकाल कर कहीं रख दो दराज में
हो गये हैं लोग अब पत्थर समाज में
मार कर दिल के जमीरों को खुदा मिलता नहीं
बेवजह ही सर झुकाये बुत खड़े नमाज में

अतुल पुण्ढीर

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