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मुक्तक

MITHILESH RAI

MITHILESH RAI

मुक्तक

April 16, 2017

उठती हुई नजर में एक आशा भी होती है!
मंजिल को छूने की अभिलाषा भी होती है!
रोशनी मौजूद है अभी जिन्दगी में लेकिन,
जज्बों के टूटने की परिभाषा भी होती है!

मुक्तककार- #महादेव'(27)

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Author
MITHILESH RAI
#महादेव

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