गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

दिल पे बोझ कम रखा करिए

इतना ना ग़म रखा करिए
दिल पे बोझ कम रखा करिए

जब ठोकरों से इतना डरते हो
सोच समझ के कदम रखा करिए

लोग देखेंगे तो नमक छिड़केंगे
छुपा के अपने ज़ख्म रखा करिए

जात और मज़हब अपनी जगह
इंसानियत का भरम रखा करिए

किसी के दर्द की दवा नहीं कर सकते
मगर हमदर्दी का मरहम रखा करिए

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