मुक्तक

आंखों में सब मंज़र चुभते हैं
हालात के ये खंजर चुभते हैं ।
लाख खो जाऊँ मैं रंगीनियों में
खोखले से ये समंदर चुभते हैं।
-अजय प्रसाद
तरस रही हैं तरक्कीयाँ कई गांवों में जाने को
कोई मददगार ही नहीं उन्हें रास्ता दिखाने को ।
वक्त के साथ-साथ बदल गई है रहनूमाई भी
अब तो सियासत करते हैं लोग सितम ढाने को ।
-अजय प्रसाद
हैसियत क्या हो गई है रिसालों की ,न पूछ
हालत आजकल के लिखनेवालों की,न पूछ ।
कल तक जो ज़ुल्म ढाते रहे सम्पादक बनके
हश्र क्या हुआ है आज,उन सालों की न पूछ ।
-अजय प्रसाद

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