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मुक्तक

Apr 21, 2020 01:58 AM

तुझ पे जाना आंसू मेरे अभी तक
उधार है जब मिलना असल नहीं
सूद जरा चुकाते हुए जाना

तेरा नाम याद रखना था दिमाग को
मैंने दिल को पहरे पे बिठा रखा था,
इस बार आना तो नाम मिटाते जाना
~ सिद्धार्थ

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Mugdha shiddharth
Mugdha shiddharth
Bhilai
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मुझे लिखना और पढ़ना बेहद पसंद है ; तो क्यूँ न कुछ अलग किया जाय......
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